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2021 के बाद पहली बार कच्चे तेल की कीमतें गिरकर 55 डॉलर प्रति बैरल पर

शुरुआत के बाद सबसे निचला स्तर

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वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। अतिरिक्त आपूर्ति और रूस-यूक्रेन युद्ध के समाप्त होने की बढ़ती उम्मीदों के बीच कच्चा तेल 55 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल गया है, जो 2021 की शुरुआत के बाद का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन में कटौती नहीं की, तो आने वाले समय में कीमतें और नीचे जाकर 40 डॉलर यहां तक ​​की 30 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं।

मंगलवार (16 दिसंबर) को अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) के फ्यूचर्स में 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई और यह एक समय 55 डॉलर से नीचे आ गया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड के फ्यूचर्स में भी 2 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आई और यह 59 डॉलर प्रति बैरल से नीचे कारोबार करता दिखा। याहू फाइनेंस के अनुसार, दोनों बेंचमार्क के लिए यह स्तर 2021 के बाद का न्यूनतम है, जब कोविड-19 महामारी के दौरान तेल की मांग में भारी गिरावट आई थी।

विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा गिरावट के पीछे प्रमुख कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की अत्यधिक आपूर्ति है। तेल उत्पादक देशों का समूह ओपेक और उसके सहयोगी देशों द्वारा उत्पादन में अपेक्षित कटौती न किए जाने से बाजार में आपूर्ति का दबाव बना हुआ है। इसके साथ ही रूस और यूक्रेन के बीच शांति वार्ता में प्रगति की खबरों से यह उम्मीद भी जगी है कि युद्ध समाप्त होने की स्थिति में रूसी तेल की वैश्विक आपूर्ति बढ़ सकती है।

अमेरिका में भी तेल उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने तेल उत्पादन को और तेज किया है और नए वर्ष में भी आपूर्ति बढ़ने की संभावना जताई जा रही है। इन सभी कारकों के चलते ब्रेंट और WTI दोनों कच्चे तेल की कीमतें साल-दर-साल आधार पर करीब 20 प्रतिशत की गिरावट के साथ वर्ष का समापन कर सकती हैं।

विश्लेषकों ने मौजूदा स्थिति को लेकर कड़ी चेतावनी दी है। जेपी मॉर्गन के रणनीतिकारों ने याहू फाइनेंस द्वारा उद्धृत एक नोट में कहा कि मांग मजबूत बने रहने के बावजूद आपूर्ति हद से ज्यादा है। उनका कहना है कि यदि ओपेक ने उत्पादन में कटौती नहीं की और अन्य उत्पादक देशों ने भी आपूर्ति धीमी नहीं की, तो कच्चे तेल की कीमतें 40 डॉलर यहां तक की 30 डॉलर प्रति बैरल तक गिर सकती हैं। ऐसे स्तर तेल उद्योग के लिए बेहद नुकसानदेह होंगे और 2020 की महामारी के दौरान देखे गए निचले स्तरों की याद दिलाते हैं।

मैक्वायरी के तेल विश्लेषकों ने भी बाजार को “कार्टून जैसी अधिक आपूर्ति” वाला बताते हुए कहा कि निकट भविष्य में हालात और ज्यादा नकारात्मक हो सकते हैं। उनके अनुसार, तेल बाजार का संतुलन पहले की अपेक्षा भी अधिक कमजोर नजर आ रहा है। कुल मिलाकर, कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक अहम संकेत मानी जा रही है, जिसका असर आने वाले महीनों में अर्थव्यवस्थाओं, ऊर्जा कंपनियों और उपभोक्ताओं पर साफ दिखाई दे सकता है।

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