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Tuesday, March 3, 2026
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चीन-पाक का JF-17 लड़ाकू विमानों की निर्यात का ‘फेक नैरेटिव’; वास्तविकता में उड़ी है धज्जियां

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इस्लामाबाद हाल के दिनों में पाकिस्तान-चीन संयुक्त रूप से निर्मित JF-17 थंडर लड़ाकू विमान के लिए वैश्विक मांग बढ़ने का दावा आक्रामक तरीके से प्रचारित कर रहा है। यह अभियान ऐसे समय तेज किया गया जब पाकिस्तान और चीन की ओर से बिना किसी प्रमाण के यह कहा गया कि उनके JF-17 और J-10 विमानों ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फ्रांस के राफेल को मार गिराया। सैन्य विश्लेषक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) हर्ष काकर के अनुसार, इन दावों का उद्देश्य चीनी मूल के प्लेटफॉर्म्स की बिक्री को बढ़ावा देना प्रतीत होता है, न कि किसी सत्यापित सैन्य उपलब्धि को सामने लाना।

अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर नजर डालें तो कई वैश्विक समाचार संस्थानों में पाकिस्तानी रिपोर्टर सक्रिय हैं, जो अक्सर अपने राज्य के प्रचार के अनुरूप नैरेटिव आगे बढ़ाते हैं। रिपोर्टर समन लतीफ ने सबसे पहले इस कथित वैश्विक मांग की कहानी शुरू की, जिसे बाद में दुनिया भर में अन्य पाकिस्तानी पत्रकारों ने आगे बढ़ाया। हालांकि, दिलचस्प रूप से, किसी भी स्वतंत्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन ने जेएफ-17 में रुचि को लेकर लतीफ के दावों का समर्थन करते हुए कोई ठोस रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की। इसके बावजूद, यह मनोवैज्ञानिक अभियान (PsyOps) सोशल और मीडिया स्पेस में तेजी से फैलता दिखा।

फ्रांसीसी खुफिया रिपोर्टों में भी पाकिस्तान-चीन के इस समन्वित दुष्प्रचार अभियान का उल्लेख किया गया है, जिसका उद्देश्य विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया के बाजारों में राफेल की छवि को नुकसान पहुंचाना रह है। यह फेक नैरेटिव फ़ैलाने का समय भी चीन के रक्षा उपकरणों में घटती रुचि से मेल खाता है, खासकर वेनेजुएला में चीनी वायु रक्षा प्रणालियों की विफलता की खबरों और पाकिस्तान में पहले हुए अनुभवों के बाद।

पाकिस्तान के मीडिया इकोसिस्टम में लगभग रोज नए ‘सौदों’ की घोषणाएं की जा रही है। 7 जनवरी को बांग्लादेश के जेएफ-17 खरीदने का दावा किया गया, 8 जनवरी को सऊदी अरब का नाम जोड़ा गया, 9 जनवरी को सूडान और उसके बाद इंडोनेशिया को संभावित खरीदार बताया गया। इससे पहले लीबिया, सूडान और इराक के कथित ‘गंभीर रुचि’ लेने की बातें कही गई थीं। इतनी तेज और असंगठित घोषणाएं किसी वास्तविक रक्षा बिक्री अभियान की विश्वसनीयता को कमजोर करती हैं।

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी एक साक्षात्कार में यह तक कहा कि JF-17 के ऑर्डर छह महीने में IMF बेलआउट की जरूरत तक खत्म कर सकते हैं। वास्तविकता यह है कि JF-17 का लगभग 58 प्रतिशत उत्पादन पाकिस्तान में और 42 प्रतिशत चीन में होता है, फिर भी इसे पूरी तरह स्वदेशी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

चीन के सोशल मीडिया हैंडल्स ने भी इस नैरेटिव को आगे बढ़ाते हुए JF-17 और J-10 को राफेल से बेहतर विकल्प के तौर पर प्रचारित किया। यह प्रयास तब और तेज हुआ, जब चीनी रक्षा उपकरणों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे।

नाइजीरिया का अनुभव इन दावों की पोल खोलता है। तीन JF-17 खरीदने के बाद वहां की वायु सेना ने कमजोर फुर्ती, सीमित एवियोनिक्स, पुराने रडार, बार-बार आने वाली तकनीकी खामियों और रखरखाव की गंभीर समस्याओं की रिपोर्ट दी। कम-खतरे वाले काउंटर-इंसर्जेंसी अभियानों में भी ये विमान अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके, जिसके बाद नाइजीरिया ने इन्हें अलग कर इतालवी एम-346एफए विमानों का विकल्प चुना।

म्यांमार में भी 2019-21 के बीच मिले विमानों में जल्द ही संरचनात्मक दरारें और तकनीकी खराबियां सामने आईं। पाकिस्तानी इंजीनियर समस्याएं दूर करने में विफल रहे, जिससे म्यांमार को रूसी सु-30 विमानों की ओर रुख करना पड़ा।

चीन का J-10 भी अब तक किसी देश से ठोस ऑर्डर हासिल नहीं कर पाया है। इंडोनेशिया ने शुरुआती रुचि के बाद 66 राफेल खरीदने का फैसला किया। हाल में इंडोनेशियाई रक्षा मंत्री की पाकिस्तान यात्रा के बाद डीजी आईएसपीआर ने जेएफ-17 में रुचि का दावा किया, लेकिन द जकार्ता टाइम्स ने इसे केवल सामान्य रक्षा सहयोग वार्ता बताया, किसी खरीद का जिक्र नहीं किया।

सऊदी अरब के कथित सौदे को भी पाकिस्तान के बकाया कर्ज से जोड़कर देखा जा रहा है। न तो रियाद की ओर से पुष्टि हुई और न ही पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के पास कोई विवरण था। एफ-15 और यूरोफाइटर उड़ाने वाला सऊदी अरब, जो एफ-35 पर भी नजर रखे है, जेएफ-17 खरीदने का कोई स्पष्ट कारण नहीं रखता।

अजरबैजान ने 2024 में 16 जेएफ-17 का ऑर्डर दिया था, जिनमें से पांच का 2025 में प्रदर्शन हुआ, लेकिन बाकी की डिलीवरी और प्रदर्शन को लेकर सवाल बने हुए हैं। बांग्लादेश, लीबिया, इराक और सूडान को लेकर भी दावे अपुष्ट हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, विमानन क्षेत्र JF-17 की सीमाओं से परिचित है। कम विश्वसनीयता, कमजोर एवियोनिक्स और सीमित उपयोगिता। राफेल को मार गिराने का तथाकथित “फर्जी ‘किल’ नैरेटिव” कुछ समय के लिए चर्चा में रहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय जांच में पाकिस्तान के नुकसान और चीनी उपकरणों की विफलताएं सामने आईं। नतीजतन, इस प्रचार से अधिकतर देशों में संदेह ही बढ़ा है।

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