आईआईटी और आईआईएम की डिग्री रखने वाली आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल की X पोस्ट ने इस बात पर बड़ी बहस छेड़ दी कि भारत की शिक्षा व्यवस्था क्या सिखाती है और क्या नहीं। उन्होंने कहा मैं “आईआईटी दिल्ली से आईआईएम बैंगलोर और फिर आईएएस तक का सफर तय किया। मुझे देश की सबसे बेहतरीन शिक्षा मिली। इसने मुझे कठिन परीक्षाएं पास करना और बड़ी जिम्मेदारियां संभालना सिखाया। लेकिन इसने कभी यह नहीं सिखाया कि अपने मन को शांत कैसे रखा जाए या अकेलेपन से कैसे निपटा जाए।”
इन शब्दों के साथ दिव्या मित्तल ने X पर एक चर्चा शुरू की, जो जल्द ही उनके निजी अनुभव से आगे बढ़कर भारत की शिक्षा प्रणाली पर व्यापक बहस में बदल गई।
आईआईटी दिल्ली और आईआईएम बैंगलोर में पढ़ाई करने के बाद सिविल सेवा में शामिल हुईं मित्तल ने लिखा कि वर्षों की पढ़ाई ने उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं और पेशेवर जिम्मेदारियों के लिए तो तैयार किया, लेकिन भावनात्मक संघर्ष, अकेलेपन और खुद को समझने के लिए नहीं।
उन्होंने लिखा, “हम अपनी जिंदगी के कई साल सफल होना सीखने में बिताते हैं, लेकिन खुश रहना सीखने में एक दिन भी नहीं।”
उनकी पोस्ट पर बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं आईं। लोगों ने इस बात पर बहस की कि क्या भारत के स्कूल और कॉलेज अंकों, रैंकिंग और प्रवेश परीक्षाओं पर जरूरत से ज्यादा जोर देते हैं, जबकि भावनात्मक स्वास्थ्य, आर्थिक समझ और जीवन कौशल पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
मित्तल ने अपनी पोस्ट में कई ऐसे क्षेत्रों का जिक्र किया जिन्हें वे औपचारिक शिक्षा में गायब मानती हैं। भावनात्मक संतुलन पर उन्होंने लिखा कि छात्रों को अकादमिक विषय तो पढ़ाए जाते हैं, लेकिन दुख, तनाव या असफलता से कैसे निपटना है, यह नहीं सिखाया जाता।
उन्होंने लिखा, “हमने पीरियॉडिक टेबल तो याद कर ली, लेकिन टूटे दिल की केमिस्ट्री किसी ने नहीं समझाई।” उनका कहना था कि छात्रों को अक्सर अपनी भावनाओं को समझने की बजाय दबाने के लिए प्रेरित किया जाता है, जिसका असर आगे चलकर इस बात पर पड़ता है कि वयस्क दबाव का सामना कैसे करते हैं।
मित्तल ने संवाद कौशल पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लोगों को निबंध लिखना और अंक लाना तो सिखाया जाता है, लेकिन असहजता व्यक्त करना, सीमाएं तय करना या कठिन परिस्थितियों में “ना” कहना नहीं सिखाया जाता। आईएएस अधिकारी ने कहा कि स्कूलों में जवाब देने वालों को पुरस्कृत किया जाता है, जबकि जिंदगी में अक्सर सवाल पूछना ज्यादा जरूरी होता है।
उन्होंने लिखा, “स्कूल में सबसे ज्यादा जवाब देने वाला जीतता था, लेकिन जिंदगी में सबसे ज्यादा सवाल पूछने वाला टिकता है।” उन्होंने आर्थिक साक्षरता का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि वर्षों तक गणित पढ़ने के बावजूद लोग कर्ज, खर्च की आदतों और आर्थिक तनाव को संभालना नहीं सीख पाते।
उनके मुताबिक, शिक्षा अक्सर पैसा कमाना तो सिखाती है, लेकिन उसे संभालना नहीं। जैसे-जैसे पोस्ट वायरल हुई, कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में पढ़ने के बाद सिविल सेवा में आने वाले लोग कहीं दूसरों के अवसर तो नहीं ले रहे।
एक यूजर ने “वन पर्सन, वन सीट” जैसी व्यवस्था पर चर्चा की बात कही। इस पर मित्तल ने जवाब दिया, “मैंने आईआईटी दिल्ली से ग्रेजुएशन और आईआईएम बैंगलोर से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आईएएस को मेरी नौकरी मानिए। दोनों शिक्षाओं ने मुझे बेहतर सेवा करने में मदद की है।”
एक अन्य यूजर ने प्रतिभा और विशेषाधिकार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सफलता कई बार परिस्थितियों पर भी निर्भर करती है। इस पर मित्तल ने जवाब दिया, “प्रतिभा को भी किस्मत कहा जा सकता है। हमें उस पर ध्यान देना चाहिए जो हमारे हाथ में है, और वह है मेहनत।” बाद में यह चर्चा छात्रों पर बढ़ते दबाव, प्रतियोगी परीक्षाओं और मानसिक स्वास्थ्य तक पहुंच गई।
कुछ लोगों ने मित्तल की इस बात से सहमति जताई कि शिक्षा व्यवस्था छात्रों को अकादमिक सफलता के लिए तैयार करती है, लेकिन भावनात्मक रूप से नहीं। वहीं कुछ लोगों का मानना था कि हर जीवन कौशल सिखाने की जिम्मेदारी सिर्फ स्कूलों की नहीं हो सकती।
बहस भारत की परीक्षा संस्कृति तक भी पहुंची, जहां आईआईटी, आईआईएम और यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में प्रदर्शन अक्सर करियर तय करता है।
दिव्या मित्तल की पोस्ट ने शिक्षा के महत्व पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि एक बड़ा प्रश्न सामने रखा - क्या शिक्षा केवल करियर के लिए तैयार करे, या फिर अनिश्चितता, असफलता, रिश्तों और वयस्क जीवन के लिए भी?
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