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Tuesday, September 29, 2026
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भारत-यूरोपीय संघ ने हस्ताक्षर किए ऐतिहासिक सुरक्षा और रक्षा समझौते पर!

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नई दिल्ली में 27 जनवरी को भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊँचाई देने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए। दौरान वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य अस्थिरता और अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है। समझौते का उद्देश्य रक्षा क्षमताओं, आतंकवाद-रोधी प्रयासों, साइबर सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में संरचित और दीर्घकालिक सहयोग को मजबूत करना है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यूरोपीय संघ के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मेजबानी की, जिसका नेतृत्व EU की विदेश और सुरक्षा नीति की उच्च प्रतिनिधि काजा कालास कर रही थीं। बैठक में भारत के तीनों सेनाध्यक्ष भी मौजूद रहे। यह चर्चा उसी दिन प्रस्तावित 16वें भारत-ईयू शिखर सम्मेलन की तैयारियों के बीच हुई।

राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत और यूरोपीय संघ को लोकतंत्र, बहुलवाद, संघवाद और कानून के शासन जैसे साझा मूल्यों ने जोड़ा है। उन्होंने रेखांकित किया कि यही मूल्य भारत-ईयू संबंधों के विस्तार की बुनियाद हैं, जो वैश्विक सुरक्षा, सतत विकास और समावेशी समृद्धि के लिए ठोस कार्रवाई में बदल रहे हैं। सिंह ने इस साझेदारी को आपसी विश्वास का प्रतीक बताते हुए कहा कि इससे दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच आर्थिक, रक्षा और जन-स्तरीय संपर्क और प्रगाढ़ होंगे।

काजा कालास ने भारत में मिले गर्मजोशी भरे स्वागत के लिए आभार जताया और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस परेड में EU अभियानों की भागीदारी का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने इस समझौते को एक “मील का पत्थर” करार देते हुए कहा कि यह द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मंचों पर व्यापक सहयोग के नए रास्ते खोलेगा। कालास ने भारत-EU संबंधों में दिखाई दे रही गति पर भरोसा जताते हुए रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने की उम्मीद व्यक्त की।

यूरोपीय परिषद के अनुसार, इस तरह की सुरक्षा और रक्षा साझेदारियाँ EU के वैश्विक शांति और सुरक्षा एजेंडे का केंद्रीय स्तंभ हैं। भारत अब जापान और दक्षिण कोरिया के बाद तीसरा एशियाई देश बन गया है, जिसने EU के साथ इस तरह का औपचारिक ढांचा स्थापित किया है। यह पहल मार्च 2022 में अपनाए गए EU के ‘स्ट्रेटेजिक कंपास’ के अनुरूप है, जो तेजी से बदलते भू-राजनीतिक हालात में सक्रिय भागीदारी पर जोर देता है।

भारत के लिए यह समझौता ‘मेक इन इंडिया’ के तहत रक्षा विनिर्माण और स्वदेशी क्षमताओं को बल दे सकता है, साथ ही उन्नत तकनीकों में संयुक्त उपक्रमों के रास्ते खोल सकता है। EU के लिए यह दक्षिण एशिया में रणनीतिक उपस्थिति मजबूत करने का अवसर है।

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि यह हिंद महासागर में समुद्री खतरों, साइबर कमजोरियों और आतंकवादी नेटवर्क जैसी साझा चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान है। इससे खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त अभ्यासों में वृद्धि हो सकती है, जिससे परिचालन क्षमता में सुधार होगा। आर्थिक रूप से, इससे रक्षा व्यापार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती को बढ़ावा मिल सकता है।
दौरान शिखर सम्मेलन के सह-अध्यक्ष यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन हैं भारत की राजकीय यात्रा पर हैं। जैसे-जैसे शिखर सम्मेलन आगे बढ़ रहा है, व्यापार, जलवायु और डिजिटल सहयोग पर पूरक समझौतों की उम्मीदें बढ़ती जा रही हैं।

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