वेस्ट बैंक संयुक्त वक्तव्य पर भारत के हस्ताक्षर; इज़राइल दौरे से पहले फिलिस्तीन नीति में निरंतरता

वेस्ट बैंक संयुक्त वक्तव्य पर भारत के हस्ताक्षर; इज़राइल दौरे से पहले फिलिस्तीन नीति में निरंतरता

India signs West Bank joint statement; Palestine policy continuity ahead of Israel visit

वेस्ट बैंक में इज़राइली बस्तियों के विस्तार की आलोचना करने वाले संयुक्त वक्तव्य पर भारत के हस्ताक्षर को लेकर उठ रहें सवालों पर वरिष्ठ राजनयिकों ने स्पष्ट किया है कि यह कदम भारत की पारंपरिक फिलिस्तीन नीति की निरंतरता है, न कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगामी इज़राइल दौरे से पहले किसी नीति बदलाव का संकेत। प्रारंभिक मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि नई दिल्ली ने 85 अन्य देशों के साथ इस बयान पर हस्ताक्षर करने से परहेज किया। हालांकि, कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि संयुक्त वक्तव्य की भाषा भारत की आधिकारिक स्थिति से मेल खाती है, ऐसे में इससे अलग रहना संभव नहीं था।

संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है, “1967 से कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी इलाके, जिसमें पूर्वी यरुशलम भी शामिल है, की जनसांख्यिकीय संरचना, चरित्र और स्थिति को बदलने के मकसद से उठाए गए सभी कदमों को खारिज किया गया है। ऐसे कदम अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हैं, इलाके में शांति और स्थिरता के लिए चल रही कोशिशों को कमज़ोर करते हैं, विस्तृत योजना के खिलाफ़ हैं, और लड़ाई को खत्म करने वाले शांति समझौते तक पहुंचने की उम्मीद को खतरे में डालते हैं।”

यह रुख भारत के विदेश मंत्रालय के पहले के बयानों से मेल खाता है। आधिकारिक रूप से भारत कहता रहा है, “भारत बातचीत से बने द्विराष्ट्र समाधान का समर्थन करता है, जिससे एक आज़ाद, सार्वभौम, कामयाब और एक फिलिस्तीन देश बनेगा, जो सुरक्षित और जानी-मानी सीमाओं के अंदर, इज़राइल के साथ शांति से रहेगा।”

भारत ने बार-बार स्पष्ट किया है कि उसका समर्थन “संबंधित UN प्रस्ताव, मैड्रिड सिद्धांत, शांति के लिए भूमि का सिद्धांत, और अरब शांति पहल” पर आधारित है। ‘मैड्रिड सिद्धांत’ और ‘लैंड फॉर पीस’ का उल्लेख 1967 की सीमाओं पर आधारित समाधान के समर्थन का संकेत देता है, जो संयुक्त वक्तव्य की भाषा में भी परिलक्षित होता है।

वरिष्ठ राजनयिकों का कहना है कि यदि भारत इस पर हस्ताक्षर नहीं करता, तो यह उसकी पारंपरिक स्थिति से विचलन का संकेत होता, जो प्रधानमंत्री के इज़राइल दौरे से ठीक पहले उचित नहीं माना जाता।

पूर्व विदेश सचिव निरुपमा राओ ने भी कहा था कि संयुक्त राष्ट्र में “UN में फ़िलिस्तीन के पक्ष में मज़बूत वोटिंग पैटर्न, पूरे कूटनीतिक संबंध से बहुत पहले से ही इज़राइल के साथ चुपचाप बातचीत के साथ मौजूद थे।” भारत ने 1992 में इज़राइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए, जबकि फिलिस्तीन के समर्थन की अपनी स्थिति बरकरार रखी।

ऐतिहासिक रूप से, यासिर अराफ़ात ने 1980 के दशक के अंत में भारत से इज़राइल को मान्यता देने का आग्रह किया था, जब पीएलओ ने स्वयं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 242 और 338 के तहत इज़राइल को मान्यता दी थी।

राजनयिक सूत्रों के अनुसार, हस्ताक्षर में हुई देरी को अत्यधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। किसी भी संयुक्त वक्तव्य की प्रत्येक पंक्ति की सावधानीपूर्वक समीक्षा की जाती है, विशेषकर तब जब प्रधानमंत्री का उच्चस्तरीय दौरा प्रस्तावित हो। इस महीने की 25 और 26 तारीख को पीएम मोदी का इज़राइल दौरा निर्धारित है।

इससे पहले भी 12 जून 2025 को भारत ने गाजा में तत्काल युद्धविराम की मांग वाले संयुक्त राष्ट्र महासभा प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया था। 12 सितंबर 2025 को भारत ने न्यूयॉर्क घोषणा का समर्थन किया, जिसमें दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया गया था, जबकि इज़राइल ने इसका विरोध किया था।

संयुक्त वक्तव्य में कोई दंडात्मक प्रावधान नहीं है और इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि नहीं माना जाता। इसे वैश्विक असंतोष के प्रतीकात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इज़राइल इस कदम को भारत की पारंपरिक नीति की निरंतरता के रूप में ही देखेगा, न कि किसी कूटनीतिक संदेश के रूप में। इस प्रकार, भारत का यह कदम उसकी दीर्घकालिक दो-राष्ट्र समाधान समर्थक नीति के अनुरूप है, जिसमें वह इज़राइल के साथ संबंधों को मजबूत रखते हुए फिलिस्तीन के वैध अधिकारों के समर्थन को भी बनाए रखता आया है।

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