भारत ताजिकिस्तान के आयनी सैन्य ठिकाने से पीछे हटना उसके रणनीतिक विकल्पों में हो रहे बदलाव को दर्शाता है। यह वापसी 2022 से भारत और ताजिकिस्तान के बीच संयुक्त उपयोग के समझौते की अवधि पूरी होते ही शुरू हुई गई। लगभग पच्चीस वर्षों तक आयनी भारत की सामरिक पहुंच का प्रमुख केंद्र रहा, जिसके माध्यम से भारत अफगानिस्तान, मध्य एशिया और पाकिस्तान की गतिविधियों की निगरानी करता रहा। भारत ने अपने सैन्य इतिहास में अक्सर पड़ोसी क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखने में भूमिका निभाई है और आवश्यक होने पर शत्रुतापूर्ण ताकतों के विस्तार को रोकने के लिए आगे बढ़कर सहयोग किया है।
आयनी से पहले भारत ने फर्खोर एयरबेस संचालित किया था, जिसे विशेष रूप से 2001 में उत्तरी गठबंधन को तालिबान के खिलाफ सहयोग देने के लिए सक्रिय किया गया था। उत्तरी गठबंधन के नेता अहमद शाह मसूद को भी हमले के बाद फर्खोर ले जाया गया था, जहां उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद भारत ने रूस और ताजिकिस्तान के सहयोग से आयनी बेस के आधुनिकीकरण में लगभग 200 मिलियन डॉलर निवेश किए, रनवे को बढ़ाया, एयर ट्रैफिक कंट्रोल सुविधाएँ स्थापित कीं और सीमित समय के लिए सु-30MKI और एमआई-17 हेलीकॉप्टरों की तैनाती भी की।
लेकिन 2021 में अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी के बाद हालात तेजी से बदल गए। तालिबान और पाकिस्तान, दोनों, भारत की ताजिकिस्तान में सैन्य उपस्थिति को नापसंद करते थे, जबकि चीन ने बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के तहत ताजिकिस्तान पर आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया। रूस रंपरागत रूप से भारत के साथ सहयोग करता रहा है, खुद यूक्रेन युद्ध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव में था और चीन के प्रभाव का खुलकर विरोध करने की स्थिति में नहीं था। इस संयुक्त भू-राजनीतिक दबाव के चलते ताजिकिस्तान ने समझौते के नवीनीकरण में रुचि नहीं दिखाई और भारत को आयनी खाली करना पड़ा।
इस तरह भारत ने केंद्रीय एशिया में मौजूद अपना एकमात्र स्थायी सैन्य ठिकाना खो दिया है। अब रणनीतिक ध्यान हिंद महासागर क्षेत्र पर केंद्रित होने की संभावना है, जहाँ चीन और पश्चिमी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और भारत अपनी समुद्री उपस्थिति को मजबूत करने की दिशा में पहले से ही कदम बढ़ा चुका है।
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