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Sunday, October 18, 2026
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भारतीय सुखोई-30 और थाई ग्रिपेन की मलक्का में होगी जोरदार जंग!

भारतीय वायुसेना के मिड-एयर रिफ्यूलर टैंकर और एयरबोर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम एडब्ल्यूएसीएस की भी तैनाती की जाएगी।

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भारतीय सेना के तीनों अंगों के साथ दुनिया के कई मित्र देश अभ्यास करना चाहते हैं। सफल ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसकी फेहरिस्त और भी लंबी हो गई है। इसी कड़ी में साल 2026 का पहला अभ्यास किसी मित्र देश की एयरफोर्स के साथ 9 फरवरी को अंडमान के पास आयोजित किया जा रहा है।

भारत और थाईलैंड की वायु सेनाओं के बीच होने वाले इस अभ्यास में भारतीय वायुसेना की ओर से फ्रंटलाइन फाइटर जेट सुखोई-30 और रॉयल थाईलैंड एयर फोर्स की ओर से ग्रिपेन फाइटर एयरक्राफ्ट हिस्सा लेंगे। भारतीय वायुसेना के मिड-एयर रिफ्यूलर टैंकर और एयरबोर्न वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम एडब्ल्यूएसीएस की भी तैनाती की जाएगी।

रक्षा अधिकारियों के अनुसार इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों की वायुसेनाओं के बीच समन्वय बढ़ाना और बेस्ट प्रैक्टिस साझा करना है। अभ्यास अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास नॉर्थ मलक्का स्ट्रेट में आयोजित किया जाएगा। भारतीय वायुसेना की ओर से 4 से 6 सुखोई विमान भाग लेंगे, जबकि रॉयल थाईलैंड एयर फोर्स के भी इतने ही ग्रिपेन इसमें शामिल होंगे।

अभ्यास के दौरान सर्च एंड रेस्क्यू के लिए समुद्र में जहाजों की भी तैनाती होगी। सुखोई-30 अंडमान के एयरबेस से टेकऑफ करेंगे, जबकि ग्रिपेन थाईलैंड के एयरबेस से उड़ान भरेंगे। इस अभ्यास का एक उद्देश्य द्वीप क्षेत्रों में लॉजिस्टिक एंड्यूरेंस की क्षमता को परखना भी है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से भारतीय वायुसेना अपने एक्सरसाइज कैलेंडर के अनुसार लगातार अभ्यास कर रही है। अगले दो महीनों में तीन बड़े वायुसेना अभ्यास प्रस्तावित हैं, जिनमें फ्रांस, अमेरिका और ग्रीस की वायुसेनाएं भारतीय वायुसेना के साथ ऑपरेशनल कौशल साझा करेंगी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुए अभ्यासों की सूची पर नज़र डालें तो भारत ने फ्रांस के साथ एक्सरसाइज गरुड़, रूस के साथ अविइंद्रा और कई मल्टीनेशनल अभ्यासों में हिस्सा लिया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी बयान के अनुसार, भारत और थाईलैंड की साझा समुद्री सीमाएँ हैं और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्र में थाईलैंड की रणनीतिक भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

भारत और थाईलैंड के द्विपक्षीय रक्षा संबंधों को भारत की ‘लुक ईस्ट’ नीति से गति मिली, जिसे बाद में ‘एक्ट ईस्ट’ नीति में उन्नत किया गया। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, मई 2003 में शुरू किए गए सुरक्षा सहयोग पर जॉइंट वर्किंग ग्रुप ने सहयोग को मजबूत करने के लिए सात प्राथमिक क्षेत्रों में से एक के रूप में सैन्य सहयोग को नामित किया।

भारत और थाईलैंड के बीच रक्षा सहयोग पर समझौता ज्ञापन (एमओयू) 25 जनवरी 2012 को हस्ताक्षरित किया गया। इस समझौते में नियमित संयुक्त अभ्यास, अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा के पास आतंकवाद, समुद्री डकैती और तस्करी का मुकाबला करने के लिए संयुक्त समुद्री गश्त, एक-दूसरे की सशस्त्र सेनाओं के प्रशिक्षण संस्थानों में अधिकारियों का प्रशिक्षण, सेवा-स्तरीय वार्ता और विभिन्न स्तरों पर यात्राओं का आदान-प्रदान शामिल है।

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