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इंडोनेशिया: इस्लामी शरिया-शासित क्षेत्र में अविवाहित जोड़े को 140–140 कोड़े, महिला बेहोश

मानवाधिकार संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया

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इंडोनेशिया का एकमात्र इस्लामी शरिया सख्ती से लागू प्रांत है, जहां एक 21 वर्षीय अविवाहित जोड़े को सार्वजनिक रूप से 140–140 कोड़े मारे गए। यह सजा गुरुवार (29 जनवरी) को बांदा आचेह के एक सार्वजनिक पार्क में दी गई। अधिकारियों के अनुसार, दोनों को विवाह से बाहर यौन संबंध बनाने और शराब सेवन का दोषी पाया गया था।

स्थानीय शरिया पुलिस के मुताबिक, सजा में दो अलग-अलग अपराधों को जोड़कर दंड तय किया गया। विवाह के बाहर यौन संबंध के लिए 100 कोड़े और शराब पीने के लिए 40 कोड़े। इस तरह कुल 140 कोड़े प्रत्येक को दिए गए, जो आचेह में 2001 में इस्लामिक आपराधिक संहिता अपनाए जाने के बाद सबसे कठोर सार्वजनिक दंडों में से एक माना जा रहा है।

सार्वजनिक फ्लॉगिंग के दौरान दर्जनों लोग मौजूद थे। महिला पर महिला अधिकारियों ने बेंत की छड़ी से प्रहार किया। चश्मदीदों के अनुसार, कई वारों के बाद महिला दर्द से कराहती रही, रोने लगी और अंततः बेहोश हो गई। इसके बाद उसे स्ट्रेचर पर एंबुलेंस तक ले जाया गया। पुरुष को भी विवाह के बाहर यौन संबंध और शराब के मामले में पूरे 140 कोड़े दिए गए।

आचेह की शरिया पुलिस ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कानून का वैध और इस्लामिक प्रवर्तन है। स्थानीय अधिकारियों का तर्क है कि ऐसे सार्वजनिक दंड सामाजिक अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। हालांकि, मानवाधिकार संगठनों ने इस सजा की कड़ी निंदा की है और इसे क्रूर, अमानवीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विपरीत बताया है। संगठनों ने दंड प्रक्रिया की समीक्षा, पीड़ितों के लिए चिकित्सा और मानसिक सहायता, तथा वैकल्पिक कानूनी उपायों की मांग की है।

इसी सार्वजनिक कार्यक्रम में अन्य मामलों में भी दंड दिया गया। एक पुलिस अधिकारी को एक महिला के साथ निकटता में पाए जाने पर 23 कोड़े लगाए गए। इससे पहले, 2025 में, शरिया पुलिस द्वारा एक समलैंगिक जोड़े को उनके संबंध उजागर होने पर 75–75 कोड़े लगाए जाने का मामला भी सामने आया था।

आचेह प्रांत को इंडोनेशिया के भीतर विशेष स्वायत्तता प्राप्त है, जिसके तहत यहां शरिया कानून लागू किए जाते हैं। सार्वजनिक कोड़े मारने जैसी सजाएं समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय आलोचना का विषय बनती रही हैं। इस ताजा घटना ने एक बार फिर धार्मिक कानूनों के प्रवर्तन, सार्वजनिक दंड और मानवाधिकारों के बीच संतुलन पर बहस को तेज कर दिया है।

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