पाकिस्तान के महत्वाकांक्षी डायमर-भाषा डैम प्रोजेक्ट के खिलाफ स्थानीय लोगों का गुस्सा लगातार उबाल पर है। ऊपरी कोहिस्तान के हरबन गांव में बीते एक हफ्ते से लोग कराकोरम हाईवे (KKH) को जाम करके बैठे हैं। यह वही मार्ग है जो गिलगित-बाल्टिस्तान को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी ज़मीन डैम निर्माण के लिए अधिग्रहित कर ली गई, लेकिन मुआवज़ा न तो पूरा मिला और न ही समय पर। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नियामत खान ने कहा, “हमारी ज़मीन ले ली गई, लेकिन मुआवज़ा नाइंसाफ़ी भरा और बेहद देर से मिला।”
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार करीब 3 अरब पाकिस्तानी रुपये का मुआवज़ा बकाया है। इसमें से लगभग 2 अरब रुपये कोहिस्तान के डिप्टी कमिश्नर के खाते में भेजे जा चुके हैं, लेकिन शेष राशि ‘कानूनी औपचारिकताओं’ के नाम पर रोकी गई है। प्रदर्शनकारी इन दलीलों को मानने से इंकार कर रहे हैं और तत्काल भुगतान की मांग कर रहे हैं।
जनजीवन पर गहरा असर
लगातार सात दिनों से जारी इस जाम ने व्यापार और आम लोगों की आवाजाही ठप कर दी है। सैकड़ों ट्रक और यात्री वाहन फंसे हुए हैं। खाने-पीने की चीज़ें, दवाइयां और अन्य जरूरी सामान अब कम पड़ने लगे हैं। प्याज और टमाटर जैसी नाशवंत वस्तुएं महंगी हो चुकी हैं। मजबूर होकर कई ट्रांसपोर्टरों को बाबूसर पास से लंबा और महंगा रास्ता अपनाना पड़ रहा है, जिससे महंगाई और बढ़ गई है।
स्थानीय व्यापारियों और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं ने गिलगित-बाल्टिस्तान और खैबर-पख्तूनख्वा की सरकारों पर उदासीनता का आरोप लगाया है। गिलगित के व्यापारी मुफ़्ती कुमैल ने कहा,“जी-बी और के-पी की सरकारें चुपचाप तमाशा देख रही हैं जबकि लोग पीड़ा झेल रहे हैं।”
इंडस नदी पर बन रहा दीामेर-भाषा डैम 272 मीटर ऊंचा होगा, जिसे पूरा होने पर दुनिया का सबसे ऊंचा RCC (रोलर-कम्पैक्टेड कंक्रीट) डैम कहा जाएगा। 200 वर्ग किलोमीटर में फैला इसका जलाशय 8.1 मिलियन एकड़-फीट पानी संग्रहित कर सकेगा। यह डैम 4,500 मेगावॉट बिजली पैदा करने, सिंचाई के लिए 12 लाख एकड़ ज़मीन को पानी उपलब्ध कराने और तरबेला डैम की उम्र 35 साल बढ़ाने का दावा करता है।
यह परियोजना चीन पावर और पाकिस्तान की फ्रंटियर वर्क्स ऑर्गनाइजेशन (FWO) मिलकर बना रही हैं। 2020 में 5.85 अरब डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ था, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत सबसे बड़े सौदों में गिना जाता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह डैम भूकंपीय क्षेत्र में बन रहा है, जहां हर महीने सैकड़ों छोटे भूकंप दर्ज होते हैं। 200 वर्ग किलोमीटर के जलाशय में हजारों एकड़ ज़मीन और करीब 100 किलोमीटर कराकोरम हाईवे डूब जाएगा। 35 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित होंगे और प्राचीन चट्टानों पर बने हजारों साल पुराने शिलालेख जलमग्न हो जाएंगे।
डैम निर्माण में 12 मिलियन टन स्टील और 22 मिलियन घन मीटर कंक्रीट लगेगा, जिससे भारी कार्बन उत्सर्जन होगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस डैम से शुरुआती 30 वर्षों तक 321 किलोग्राम CO2 प्रति मेगावॉट-घंटा उत्सर्जित होगा, जो कोयला-आधारित बिजलीघरों के बराबर है। इसके अलावा, सिंधु डेल्टा में पानी का प्रवाह और घटेगा, जिससे मैंग्रोव जंगलों और मत्स्य संसाधनों पर गंभीर खतरा मंडराएगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक उनका हक नहीं मिलेगा, वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। अब हालात ऐसे बन चुके हैं कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो यह आंदोलन मानवीय संकट में बदल सकता है।
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