इस्लामिक नाटो: क्या तुर्की के हथियार, पाकिस्तानी परमाणु क्षमता और सऊदी आ रहें है एक साथ?

इस्लामिक नाटो: क्या तुर्की के हथियार, पाकिस्तानी परमाणु क्षमता और सऊदी आ रहें है एक साथ?

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तुर्की के सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच उभर रहे रक्षा गठबंधन में शामिल होने की तैयारी ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों द्वारा इसे अनौपचारिक रूप से ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। यदि यह गठबंधन औपचारिक रूप लेता है, तो भारत समेत कई देशों के लिए इसके रणनीतिक निहितार्थ गहरे हो सकते हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच घोषित “Strategic Mutual Defense Agreement” नाटो के अनुच्छेद-5 से मिलता-जुलता है, जिसमें सामूहिक सुरक्षा की गारंटी ली गई है। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने कहा था कि “किसी एक देश के खिलाफ किसी भी आक्रमण को दोनों के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा।” अब तुर्की के इसमें शामिल होने की संभावना इस ढांचे को और व्यापक बना सकती है।

‘इस्लामिक नाटो’ क्या है?

‘इस्लामिक नाटो’ की अवधारणा एक ऐसे रक्षा गठबंधन की है, जिसमें इस्लामिक और अरब देश सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के तहत जुड़े हों। पिछले वर्ष सितंबर में अरब लीग और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) की आपात बैठक में मिस्र ने अरब देशों के लिए नाटो जैसी संयुक्त टास्क फोर्स की सिफारिश की थी। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के छह सदस्य देश बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी संयुक्त रक्षा समझौते के प्रावधान को दोहराया था, जिसके अनुसार एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा।

इसी पृष्ठभूमि में पाकिस्तान ने एक संयुक्त टास्क फोर्स की मांग करते हुए कहा था कि वह, “क्षेत्र में इजरायली मंसूबों की निगरानी करे और इजरायल के विस्तारवादी डिजाइन को रोकने के लिए प्रभावी प्रतिरोधी और आक्रामक उपाय अपनाए।”

तुर्की क्यों दिखा रहा है रुचि?

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की इस पाक–सऊदी रक्षा ढांचे में शामिल होने के लिए बातचीत के उन्नत चरण में है और तुर्की से समझौता काफी हद तक संभव होता दिखाई दे रहा है। तुर्की पहले से नाटो का सदस्य है और अमेरिका के बाद उसका सबसे बड़ा सैन्य बल है।

अंकारा स्थित थिंक टैंक TEPAV के रणनीतिकार निहात अली ओज़कान ने कहा है, “सऊदी अरब के पास वित्तीय ताकत है, पाकिस्तान के पास परमाणु क्षमता, बैलिस्टिक मिसाइलें और मानव संसाधन हैं, जबकि तुर्की के पास सैन्य अनुभव है और उसने एक मजबूत रक्षा उद्योग विकसित किया है।” उन्होंने यह भी कहा की, “जैसे-जैसे अमेरिका अपने और इजरायल के हितों को प्राथमिकता दे रहा है, बदलती परिस्थितियां देशों को नए सुरक्षा तंत्र विकसित करने के लिए प्रेरित कर रही हैं।”

भारत के लिए क्या होंगे इस्लामिक नाटो के मायने?

भारत ऐसे किसी भी संभावित गठबंधन को सतर्क नजर से देखेगा। मई में भारत और पाकिस्तान के बीच चार दिन तक चले सैन्य टकराव के दौरान भारत ने खुलासा किया था कि कैसे पाकिस्तान ने तुर्की निर्मित ड्रोन का इस्तेमाल किया था। ऑपरेशन सिंदूर में आतंकियों को पिन पॉइंट एक्युरेसी के साथ ध्वस्त करने के बाद तुर्की ने पाकिस्तान के प्रति समर्थन जताते हुए भारत की कार्रवाई को पाकिस्तान की संप्रभुता का उल्लंघन और निर्दोष नागरिकों की हत्या बताकर दिखा दिया था की बात आतंकवाद की होगी तब भी तुर्की पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा होगा।

सेवानिवृत्त एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के अनुसार,  “यदि यह गठबंधन अंतिम रूप लेता है, तो यह भारत, इजरायल, आर्मेनिया और साइप्रस जैसे देशों के लिए गंभीर चुनौती और खतरा बन सकता है।” हालांकि, कुछ विश्लेषक इसे नाटो जैसे ठोस गठबंधन में बदलने को अव्यावहारिक मानते हैं।

दौरान किंग्स कॉलेज लंदन के एंड्रियास क्रिग ने कहा, “नाटो-शैली का गठबंधन अवास्तविक है, क्योंकि यह खाड़ी देशों को ऐसे युद्धों में बांध देगा, जिन्हें वे अपने हितों के लिए आवश्यक नहीं मानते।” कुल मिलाकर, ‘इस्लामिक नाटो’ अभी एक अवधारणा ही है, लेकिन तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बढ़ते सैन्य–रणनीतिक तालमेल ने भारत के लिए सतर्कता की आवश्यकता निर्माण की है।

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