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Saturday, October 24, 2026
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काशी : मां संकटा मंदिर में शिवभक्तों को मिलता कष्टों से मुक्ति! 

इन सभी मंदिरों का अपना पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक इतिहास रहा है, जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ता है। गंगा मां की गोद में मां भगवती के ऐसे रूप की पूजा होती है|  

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बनारस में बहती गंगा भक्तों के पापों का नाश करती है और जन्म-जन्मांतर के फेर से मुक्ति दिलाती है। वहीं गंगा के तट पर कई देवी-देवताओं के मंदिर स्थित हैं, जो सभी कष्टों को हरने की ताकत रखते हैं।

इन सभी मंदिरों का अपना पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक इतिहास रहा है, जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ता है। गंगा मां की गोद में मां भगवती के ऐसे रूप की पूजा होती है, जो भक्तों के संकट हरने के लिए प्रसिद्ध है। खास बात ये है कि जब भगवान शिव के पास भी संकट का समाधान नहीं था, तब वे भी मां संकटा के चरणों में पहुंचे थे।

आदिशक्ति स्वरूपा मां संकटा मंदिर बनारस की तंग गलियों में मौजूद है, लेकिन फिर भी मां को पूजने वाले भक्तों की संख्या में कमी नहीं है। भक्तों और स्थानीय लोगों को विश्वास है कि मां आने वाले संकट को भी हर लेती हैं और उन्हें उपचार की देवी के नाम से भी जाना जाता है। संकट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, मां संकटा हर तरह के संकट को भक्तों से दूर कर देती हैं। यही कारण है कि मां की प्रातः काल और संध्या काल आरती में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है।

मंदिर के गर्भगृह में मां देवी संकटा की विशाल प्रतिमा है, जिनकी चार भुजाएं हैं। मां का रोजाना फूलों से अलग-अलग शृंगार किया जाता है और अन्नकूट शृंगार को बेहद खास माना गया है। मान्यता है कि मां अपने किसी भी बच्चों को भूखा नहीं सोने देती और उनका पेट भरने के लिए अन्न की देवी के रूप में विद्यमान हैं। मंदिर में प्रवेश द्वार पर विशाल सिंह भी देखने को मिलेगा, जो मां की सवारी है। इसके साथ ही मंदिर में नौ ग्रहों की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं।

चार भुजाओं वाली देवी संकटा इस मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण देवी हैं। देवी की चांदी से मढ़ी प्रतिमा लगभग चार से पांच फीट ऊंची है और इसे नारी पूजा का प्रतीक माना जाता है। मां की रक्षा के लिए उनकी प्रतिमा के साथ हनुमान और भैरव दोनों स्थापित हैं। ऐसा माना जाता है कि पांडव अपने वनवास के दौरान देवी संकटा की पूजा करने के लिए इस स्थान पर आए थे।

नवरात्रि के नौ दिन मंदिर में भव्य आयोजन और अनुष्ठान किए जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में से आठवां दिन मां संकटा देवी को समर्पित होता है। माना जाता है कि मां सकंटा मां वैष्णो देवी की छोटी बहन हैं, जो त्रिकुटा पर्वत पर विराजमान हैं।

यह दोनों दिव्य शक्तियां मिलकर भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। अगर आप भी मां संकटा मंदिर का आशीर्वाद लेना चाहते हैं तो मंदिर की वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से दूरी मात्र 6 किलोमीटर है, जबकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से 3 किलोमीटर है।
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