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Mahakumbh 2025: 8495 नए सैनिक 2300 महिलाएं शामिल; विशाल हुई नागा अखाड़ों की सेना!

गंगा तट पर आयोजित नागा संत दीक्षा संस्कार में धर्म ध्वजा के नीचे मिला गुरु मंत्र। नागा की दीक्षा के लिए यह आदर्श समय माना जाता है।

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कुंभ-महाकुंभ के दौरान नागा संन्यासी को दीक्षा देने की परंपरा के पीछे कई ऐतिहासिक, धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं। कुंभ मेले के दौरान लाखों साधु-संत और श्रद्धालु एकत्र होते हैं। यह साधुओं और विभिन्न अखाड़ों के लिए महत्वपूर्ण समय होता है, जब वे अपने अनुयायियों को दीक्षा देते हैं। नागा की दीक्षा के लिए यह आदर्श समय माना जाता है। 

अवधूत बनने वालों को तीन से छह वर्ष तक समर्पित भाव से जुड़कर काम करना होगा। इसमें खरा उतरने पर कुंभ के दौरान दिगंबर की उपाधि दी जाएगी। दिगंबर बनने के बाद वह अखाड़े के अभिन्न अंग बन जाएंगे। 

सगे-संबंधियों, सुख-सुविधाओं से मुक्त होकर सनातन धर्म को जीवन समर्पित करने वाले नागा संन्यासियों की सेना अब और विशाल है। मंगलवार की मध्य रात्रि में धर्म ध्वजा के नीचे अखाड़ों के आचार्य महामंडलेश्वर ने उन्हें दीक्षा दी। कुल 8495 नागा संन्यासी हैं, जिनमें 2300 महिलाएं हैं। गायत्री व अवधूत मंत्र देकर अखाड़े की परंपरा, नीति-नियम के बारे में बताया। मंत्र का वह नियमित जप करेंगे।

आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों का गठन किया था। नागा संन्यासी अखाड़े के योद्धा होते हैं। उन्हें अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण देकर लड़ाका बनाया जाता है, जिससे धर्म अथवा सनातन धर्मावलंबियों के ऊपर संकट आए तो युद्ध करके उनकी रक्षा कर सकें। कुंभ-महाकुंभ में अखाड़े बनाए जाते हैं।

मकर संक्रांति के बाद नागा संन्यासी बनाने का क्रम आरंभ हुआ, जो निरंतर चलता रहा। संन्यास लेने वाले महिला और पुरुषों को मंत्रोच्चार के बीच 108 डुबकी लगवाकर पिंडदान कराया गया। उन्हें नया नाम देकर दीक्षित किया गया था। दीक्षा मिलने के बाद वह अखाड़े के शिविर में रहकर भजन-पूजन में लीन थे।

किस अखाड़े में बने नागा संन्यासी व संन्यासिनी: जूना अखाड़ा ने 4500 संन्यासी, 2150 संन्यासिनी, महानिर्वाणी में 250, निरंजनी ने 1100 पुरुष व 150 संन्यासिनी, अटल में 85 संन्यासी, आवाहन में 150, बड़ा उदासीन ने 110 तंग तोड़ा (नागा संन्यासी) बनाए हैं। अखाड़े से जुड़े संतों का जीवन लोग वैभवपूर्ण मानते हैं, लेकिन नागा सबसे ज्यादा त्यागी होते हैं। निर्वस्त्र रहने वाले नागा संन्यासी पिंडदान के साथ अंगतोड़ की प्रक्रिया पूर्ण करते हैं। बिना अंग तोड़ कराए कोई नागा नहीं बनता। 

अंगतोड़ का शाब्दिक अर्थ है अंगों को तोड़ना। नागा संन्यासी के लिए यह सांसारिक बंधनों से स्वयं को पूरी तरह मुक्त करना है। इस प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्ति सांसारिक सुख-सुविधाओं, परिवार, और भौतिक वस्तुओं से पूरी तरह से अलग हो जाता है। अपने पूरे जीवन को आध्यात्मिक साधना और तपस्या के लिए समर्पित करता है।

अंग तोड़ के बाद संन्यासी को कठिन तपस्या करनी होती है। इसमें योग, ध्यान और साधना शामिल है, जिससे व्यक्ति अपनी आत्मा को शुद्ध और शक्तिशाली बनाता है। नागा संन्यासी को आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करना अनिवार्य है।

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