मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने हिंदू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रीय अखंडता पर जोर देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान ‘बंटोगे तो कटोगे’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री अपनी सभाओं में यह बात कहते हैं, जिसका अर्थ है कि भारत में रहने वाले सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों को एकजुट होकर रहना चाहिए।
हरिद्वार की घटना और ‘मोहम्मद दीपक’ नाम को लेकर उठे विवाद पर मौलाना ने कहा कि कुछ दिन पहले कुछ शरारती तत्व एक मुस्लिम बुजुर्ग के पास पहुंचे और उनके साथ बदतमीजी तथा मारपीट करने लगे। उस समय वहां मौजूद उनके पड़ोसी दीपक ने बुजुर्ग का बचाव किया। दीपक ने हमलावरों से कहा कि वे बुजुर्ग से न लड़ें, बल्कि उनसे मुकाबला करें। जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया।
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने दीपक के इस कदम को एक पीड़ित व्यक्ति की मदद के लिए आगे आने के रूप में देखा। हालांकि, उन्होंने धार्मिक दृष्टिकोण से मोहम्मद शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि शरीयत के अनुसार किसी गैर-मुस्लिम व्यक्ति को ‘मोहम्मद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह पैगंबर-ए-इस्लाम का नाम है और मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र और सम्मानित है। उन्होंने कहा कि इस नाम की धार्मिक गरिमा को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
लखनऊ मेडिकल कॉलेज से जुड़े धर्मांतरण मामले पर मौलाना ने कहा कि यह मामला काफी समय से चर्चा में है और इसकी जांच-पड़ताल चल रही है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार के पास ऐसे तथ्य हैं कि किसी व्यक्ति का जबरन, दबाव बनाकर या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति कानून की नजर में दोषी है।
मौलाना ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था दबाव डालकर अथवा लालच देकर किसी का धर्म परिवर्तन कराती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने दोहराया कि ऐसा काम शरीयत की नजर में भी गलत है और कानून के तहत भी अपराध है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू करने की बात कहे जाने पर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने विरोध जताया। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता लागू करने का संवैधानिक सिद्धांत यह होना चाहिए कि राज्य में रहने वाले सभी समुदायों और वर्गों से राय ली जाए।
मौलाना ने कहा कि मुसलमान यूसीसी को शरीयत में हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। जो कानून शरीयत के सिद्धांतों में दखल देगा, वह मुसलमानों को स्वीकार नहीं होगा। यदि यूसीसी में शरीयत के उसूलों का ध्यान रखा जाता है तो मुसलमान उसे स्वीकार करने पर विचार कर सकते हैं। अन्यथा ऐसा कानून उनके लिए मंजूर नहीं होगा।
