मौलाना शहाबुद्दीन बोले, जबरन धर्मांतरण इस्लाम और कानून दोनों में गलत!

वहीं, उत्तर प्रदेश में (यूसीसी) लागू करने की चर्चा पर उन्होंने कहा कि इस कानून को लागू करने से पहले सभी समुदायों की राय लेना जरूरी है और शरीयत के सिद्धांतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

मौलाना शहाबुद्दीन बोले, जबरन धर्मांतरण इस्लाम और कानून दोनों में गलत!

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मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति का जबरदस्ती, दबाव बनाकर या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराना इस्लाम और देश के कानून दोनों के तहत गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा और खुशी से धर्म परिवर्तन करता है तो इसमें आपत्ति नहीं है, लेकिन किसी संस्था या व्यक्ति द्वारा दबाव डालकर ऐसा कराना अपराध है।
लखनऊ मेडिकल कॉलेज से जुड़े धर्मांतरण मामले पर उन्होंने जांच के बाद दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। वहीं, उत्तर प्रदेश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने की चर्चा पर उन्होंने कहा कि इस कानून को लागू करने से पहले सभी समुदायों की राय लेना जरूरी है और शरीयत के सिद्धांतों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने हिंदू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रीय अखंडता पर जोर देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान ‘बंटोगे तो कटोगे’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री अपनी सभाओं में यह बात कहते हैं, जिसका अर्थ है कि भारत में रहने वाले सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों को एकजुट होकर रहना चाहिए।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध समुदाय के लोग आपसी भाईचारे और एकता के साथ रहें। यदि देश का प्रत्येक नागरिक एक-दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा तो कोई विदेशी ताकत भारत को तोड़ने या बांटने में सफल नहीं होगी। देश की एकता और अखंडता बेहद जरूरी है, ताकि विदेशी ताकतों के मंसूबों को नाकाम किया जा सके।

हरिद्वार की घटना और ‘मोहम्मद दीपक’ नाम को लेकर उठे विवाद पर मौलाना ने कहा कि कुछ दिन पहले कुछ शरारती तत्व एक मुस्लिम बुजुर्ग के पास पहुंचे और उनके साथ बदतमीजी तथा मारपीट करने लगे। उस समय वहां मौजूद उनके पड़ोसी दीपक ने बुजुर्ग का बचाव किया। दीपक ने हमलावरों से कहा कि वे बुजुर्ग से न लड़ें, बल्कि उनसे मुकाबला करें। जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया।

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने दीपक के इस कदम को एक पीड़ित व्यक्ति की मदद के लिए आगे आने के रूप में देखा। हालांकि, उन्होंने धार्मिक दृष्टिकोण से मोहम्मद शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि शरीयत के अनुसार किसी गैर-मुस्लिम व्यक्ति को ‘मोहम्मद’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह पैगंबर-ए-इस्लाम का नाम है और मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र और सम्मानित है। उन्होंने कहा कि इस नाम की धार्मिक गरिमा को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

लखनऊ मेडिकल कॉलेज से जुड़े धर्मांतरण मामले पर मौलाना ने कहा कि यह मामला काफी समय से चर्चा में है और इसकी जांच-पड़ताल चल रही है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार के पास ऐसे तथ्य हैं कि किसी व्यक्ति का जबरन, दबाव बनाकर या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया गया है तो ऐसा करने वाला व्यक्ति कानून की नजर में दोषी है।

इस्लाम भी इस तरह के कृत्य की अनुमति नहीं देता। इस्लाम में किसी को ताकत या लालच के जरिए धर्म स्वीकार कराने की इजाजत नहीं है। पैगंबर-ए-इस्लाम की शिक्षाएं और उनका जीवन यही संदेश देते हैं कि धर्म परिवर्तन व्यक्ति की अपनी इच्छा, खुशी और सहमति से होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से धर्म बदलता है तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है, लेकिन उस पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए।

मौलाना ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था दबाव डालकर अथवा लालच देकर किसी का धर्म परिवर्तन कराती है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने दोहराया कि ऐसा काम शरीयत की नजर में भी गलत है और कानून के तहत भी अपराध है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से उत्तर प्रदेश में यूसीसी लागू करने की बात कहे जाने पर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने विरोध जताया। उन्होंने कहा कि समान नागरिक संहिता लागू करने का संवैधानिक सिद्धांत यह होना चाहिए कि राज्य में रहने वाले सभी समुदायों और वर्गों से राय ली जाए।

यदि सभी की सहमति हो, तभी इसे लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। जिन राज्यों में यूसीसी लागू किया गया है, वहां मुसलमानों से उचित परामर्श नहीं किया गया। साथ ही, अनुसूचित जनजातियों और कुछ अलग-अलग समुदायों को इससे अलग रखा गया है। ऐसे में एक देश और एक कानून की अवधारणा को किस तरह लागू किया जा रहा है, इस पर सवाल उठते हैं।

मौलाना ने कहा कि मुसलमान यूसीसी को शरीयत में हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। जो कानून शरीयत के सिद्धांतों में दखल देगा, वह मुसलमानों को स्वीकार नहीं होगा। यदि यूसीसी में शरीयत के उसूलों का ध्यान रखा जाता है तो मुसलमान उसे स्वीकार करने पर विचार कर सकते हैं। अन्यथा ऐसा कानून उनके लिए मंजूर नहीं होगा।

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