पाकिस्तान में केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतें ही नहीं बढ़ी हैं, बल्कि खाद्य पदार्थों के दाम भी तेजी से बढ़ गए हैं। अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का असर वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है, जिसका प्रभाव कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है। इसी का असर पाकिस्तान पर भी पड़ा है और पहले से कमजोर उसकी अर्थव्यवस्था और अधिक संकट में चली गई है। मध्य पूर्व के संघर्ष के कारण पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ ब्रेड, दूध, आटा, दाल और चावल जैसी जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है।
सरकारी आंकड़े भी इन बढ़ी हुई कीमतों की पुष्टि करते हैं। पाकिस्तान के कराची शहर में दूध की कीमत 240 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है, जबकि ब्रेड लगभग 160 रुपये में बिक रही है। वहीं सेब 316 रुपये प्रति किलो और संतरे करीब 280 रुपये प्रति किलो की दर से बेचे जा रहे हैं।
पाकिस्तान सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार 11 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में महंगाई सूचकांक (SPI) में 6.44 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। पेट्रोलियम उत्पादों और आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के कारण यह साल-दर-साल वृद्धि दर्ज की गई है। पाकिस्तान में अल्पकालिक महंगाई का प्रमुख सूचक ‘सेंसिटिव प्राइस इंडिकेटर’ (SPI) 1.89 प्रतिशत बढ़ा है, जो घरेलू जरूरत की वस्तुओं की कीमतों में तेजी को दर्शाता है। रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल की कीमतें एक सप्ताह में 20.60 प्रतिशत और डीजल की कीमतें 19.54 प्रतिशत बढ़ गईं। एलपीजी की कीमतों में भी 12.13 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे महंगाई और बढ़ गई।
खाद्य पदार्थों की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखी गई। प्याज 9.63 प्रतिशत, केले 1.44 प्रतिशत और गेहूं के आटे की कीमत 1.28 प्रतिशत बढ़ी है। इसके अलावा चिकन 0.66 प्रतिशत, मसूर दाल 0.55 प्रतिशत, लकड़ी 0.38 प्रतिशत, चना 0.10 प्रतिशत, ताजा दूध 0.08 प्रतिशत और पका हुआ गोमांस 0.02 प्रतिशत महंगा हुआ है।
पाकिस्तान में एक व्यक्ति को प्रतिदिन 2,400 कैलोरी वाला संतुलित भोजन करने के लिए कम से कम 1,073.04 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यानी महीने में लगभग 33,264.29 रुपये का खर्च केवल भोजन पर आता है। इसमें दूध, ब्रेड, चावल, अंडे, चीज, चिकन, फल और सब्जियां जैसी आवश्यक चीजें शामिल हैं। इन वस्तुओं की कीमतों को जोड़ने पर अनुमान है कि केवल बुनियादी पौष्टिक भोजन के लिए ही प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 1,000 रुपये से अधिक खर्च करना पड़ता है। इससे स्पष्ट है कि आम परिवारों के लिए मौजूदा कीमतों में अच्छा और संतुलित भोजन करना दिन-ब-दिन कठिन होता जा रहा है।
हाल ही में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अल्पकालिक रेमिटेंस और बाहरी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता के कारण पाकिस्तान एक खतरनाक आर्थिक जाल में फंसता जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान की जीडीपी में रेमिटेंस का हिस्सा लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो निर्यात आय के बराबर है। यह बंद होते कारखानों, बढ़ती बेरोजगारी और उत्पादन क्षमता के कम उपयोग जैसी आर्थिक कमजोरियों को छिपा रहा है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 1958 से अब तक पाकिस्तान ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के कार्यक्रमों में 26 बार भाग लिया है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। इन कार्यक्रमों के तहत पाकिस्तान को अब तक 34 अरब डॉलर से अधिक की सहायता मिल चुकी है। 2024 में शुरू किया गया 7 अरब डॉलर का विस्तारित फंड सुविधा कार्यक्रम 2025–26 तक बढ़ा दिया गया है, जो देश की बाहरी मदद पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि 2026 से 2031 के बीच कर्ज, महंगाई और बढ़ती गरीबी के कारण पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर गहरा असर पड़ सकता है, जिससे आम लोगों के घरेलू बजट पर और अधिक दबाव बढ़ेगा।
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