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आखिर किस डर ने मुनीर को कानूनी ‘अभेद्य कवच’ लेने पर मजबूर किया

ऑपरेशन सिंदूर की चोट और सत्ता की दरारें उजागर

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पाकिस्तान में 27वां संवैधानिक संशोधन केवल एक राजनीतिक कदम नहीं—यह सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर द्वारा खुद को कानून, सैन्य प्रतिरोध और ऑपरेशन ‘सिंदूर’ की आंतरिक चोटों से बचाने के लिए तैयार किया गया एक अभूतपूर्व संरचनात्मक कवच है। देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माने जाने वाले मुनीर आखिर इतना क्यों घबरा गए कि उन्हें आजीवन कानूनी प्रतिरक्षा और सेना, वायुसेना तथा नौसेना पर सर्वाधिकार लेने की आवश्यकता महसूस हुई? इसका जवाब पाकिस्तान की उन कठोर वास्तविकताओं में छिपा है, जिनसे खुद सेना प्रमुख भी भयभीत रहे होंगे।

संशोधन लागू होते ही मुनीर पाकिस्तान के वास्तविक ‘सुप्रीम कमांडर’ बन जाएंगे। वायुसेना और नौसेना भी अब उनकी सीधी कमान में होंगी। नई नियुक्तियां जैसे एयर चीफ़ और नेवी चीफ़ पर भी उनका निर्णायक प्रभाव होगा। परमाणु हथियारों का नियंत्रण भी उनके करीब आ जाएगा, भले ही एक प्रॉक्सी व्यवस्था के माध्यम से।

लेकिन सबसे चौंकाने वाला पहलू है इस संशोधन के तहत उन्हें मिलने वाली आजीवन कानूनी सुरक्षा। संशोधन कहता है कि मुनीर और वायुसेना व नौसेना के पांच-सितारा अधिकारी “जीवन भर वर्दी में रहेंगे”, उनके रैंक और विशेषाधिकार कायम रहेंगे, और उन्हें केवल महाभियोग के माध्यम से ही हटाया जा सकेगा। उन्हें राष्ट्रपति के समान प्रतिरक्षा मिलेगी। यानी मुनीर के खिलाफ किसी भी कानूनी कार्रवाई का रास्ता लगभग बंद हो गया है।

पाकिस्तान के विश्लेषक मानते हैं कि इस संशोधन की जरूरत अचानक नहीं पड़ी—मुनीर महीनों से सत्ता की पकड़ ढीली पड़ने की आशंकाओं से जूझ रहे थे।

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने सेना के खिलाफ ऐसा विद्रोह खड़ा किया जो पहले कभी नहीं देखा गया। उनके समर्थक सेना मुख्यालय पर धावा बोल गए, कमांडरों के घरों पर हमले हुए, और पूरे पाकिस्तान में यह धारणा बन गई कि सेना ने इमरान को गिराने और जेल भेजने में भूमिका निभाई। सेना की यह बदनामी इतिहास में पहली बार इतनी व्यापक और गहरी थी और इसका खामियाज़ा मुनीर को भुगतना पड़ रहा था।

पाकिस्तान सेना दशकों से आंतरिक धड़ों में बंटी रही है। कौन सा कोर और कौन सा गुट कितनी शक्ति रखता है, इसका असर हमेशा शीर्ष पदों पर देखा जाता रहा है। मुनीर भी इससे अछूते नहीं थे उनकी सत्ता निर्विवाद नहीं थी।
अलोकप्रियता के माहौल में, किसी भी गुटीय साज़िश या अंदरूनी संघर्ष की कीमत भारी पड़ सकती थी।

मुनीर के पास शक्ति थी, पर संस्था के स्तर पर नहीं। 27वां संशोधन उनके लिए यह संस्थागत सुरक्षा लेकर आया, अब वे पूरे सैन्य ढांचे के सर्वोच्च अधिकारी हैं, जिन्हें न एयर चीफ़ चुनौती दे सकता है, न नेवी चीफ़ और न ही CJCSC, जिस पद को वे खत्म करने की कोशिश में हैं।

2019 के बालाकोट हमलों के बाद बताया गया था कि उस समय वायुसेना प्रमुख मुजाहिद अनवर खान और CJCSC जनरल जुबै़र महमूद हयात ने तत्कालीन सेना प्रमुख बाजवा को भारत के खिलाफ प्रतिक्रिया पर ‘ओवररूल’ कर दिया था।
अंत में इमरान खान को NSC के प्रमुख के रूप में हस्तक्षेप करना पड़ा। मुनीर नहीं चाहते कि भविष्य में कोई भी एयर चीफ़, नेवी चीफ़ या सैन्य गुट उन्हें ऐसी स्थिति में धकेल सके।

पाकिस्तानी सेना भले ही जनता को ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में जीत का भ्रम बेचती रही हो, पर अंदरूनी स्तर पर हकीकत अलग थी। भारत के हाथों मिली करारी चोट ने सैन्य प्रतिष्ठान को हिला दिया। विशेष रूप से मुनीर की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे और यह कमजोरी उनके खिलाफ किसी साज़िश या ‘विंग क्लिपिंग’ की कोशिश का बहाना बन सकती थी।

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