आईजीपी अदालत में उस समय पेश हुए, जब मुख्य न्यायाधीश आलिया नीलम पंजाब के फैसलाबाद की निवासी सादिया हुसैन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थीं। याचिका में सादिया ने अपनी लापता बेटी को बरामद करने की मांग की थी। यह जानकारी पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन ने दी।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने पंजाब में लापता लड़कियों से जुड़े मामलों की संख्या के बारे में पूछा। इस पर आईजीपी ने बताया कि प्रांत में ऐसे 500 से अधिक मामले लंबित हैं।
मुख्य न्यायाधीश आलिया नीलम ने टिप्पणी की कि पुलिस तब ही सक्रिय दिखाई देती है जब अदालत किसी मामले का संज्ञान लेती है। उन्होंने एक ऐसे मामले का उल्लेख किया, जिसमें एक लड़की दो वर्षों तक लापता रही और अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही उसे खोजा जा सका।
इस बीच, अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी ने कहा कि पंजाब की राजधानी लाहौर में वर्ष 2026 के पहले आठ महीनों में 498 दुष्कर्म और 36 सामूहिक दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए हैं।
इन आंकड़ों पर गहरी चिंता जताते हुए संगठन ने कहा कि इसका मतलब है कि शहर में प्रतिदिन औसतन चार से अधिक यौन अपराध दर्ज किए गए।
संगठन ने कहा, ”कोई भी इलाका इससे अछूता नहीं है और कोई भी समुदाय पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यदि अप्राकृतिक यौन शोषण (सोडोमी) के मामलों को भी शामिल किया जाए, तो आठ महीनों में कुल 1,108 यौन अपराधों के मामले दर्ज हुए हैं। ये अपराध केवल सुनसान या पिछड़े इलाकों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अमीर बस्तियों, भीड़भाड़ वाले बाजारों और शांत रिहायशी क्षेत्रों में भी हो रहे हैं। हिंसा हर जगह है और उसके साथ डर भी मौजूद है।”
वीओपीएम ने यह भी कहा कि ये आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं दिखाते। मानवाधिकार संगठनों का लंबे समय से कहना है कि दर्ज एफआईआर वास्तविक अपराधों की तुलना में बहुत कम होती हैं।
संगठन के मुताबिक, ”सामाजिक बदनामी, शर्म, पारिवारिक दबाव, पुलिस पर भरोसे की कमी और समाज से बहिष्कृत किए जाने के डर के कारण कई पीड़ित सामने नहीं आते। बहुत से लोग शिकायत दर्ज नहीं कराते, कई को चुप रहने के लिए कहा जाता है और कई मामलों में पीड़ितों को ही दोषी ठहराया जाता है।
