2009 में नेदा आगा सोल्तान की मौत ने दुनिया को यह दिखाया था कि ईरान में विरोध की कीमत कितनी भारी हो सकती है। एक साधारण नागरिक, जो किसी बड़े राजनीतिक मंच का हिस्सा नहीं थी, अचानक दमन और हिंसा का वैश्विक प्रतीक बन गई। 20 जून 2009 को फर्जी तरीके से जारी किए गए चुनावी नतीजों के विरोध में जारी प्रदर्शन को सड़क से गुजरते देख रही थी तभी एक गोली आई और 2 मिनट में नेदा की मौत हो गई।
इसी दौरान किसी ने नेदा का वीडियो बनाया। वह सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, और नेदा प्रतीक बन गईं। वह ईरान की आवाज बन गईं। “नेदा” का मतलब ही “आवाज” और “पुकार” होता है।
वर्तमान के प्रदर्शनों में शामिल युवा, महिलाएं और कामकाजी वर्ग उसी स्मृति को अपने भीतर लिए हुए दिखते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब विरोध केवल चुनाव या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन की हर उस पाबंदी के खिलाफ है जो व्यक्ति की गरिमा को कुचलती है। ईरान आज एक बार फिर सड़कों पर उतर आए गुस्से, डर और उम्मीद के मिले-जुले भाव से गुजर रहा है।
महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक पाबंदियां और राजनीतिक दमन के खिलाफ उठ रही आवाजें केवल तात्कालिक असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे एक लंबे संघर्ष की निरंतरता हैं।
वर्तमान हालात में सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने विरोध को नई भाषा दी है, लेकिन सत्ता की प्रतिक्रिया में कठोरता का पैटर्न पुराना ही दिखाई देता है। इंटरनेट बंद है, गिरफ्तारी और डर का माहौल, ये सब पहले भी देखे जा चुके हैं।
इन आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। नेदा केवल एक शिकार नहीं थीं; वे उस महिला चेतना का प्रतीक बन गईं जो सार्वजनिक जीवन में अपनी जगह मांगती है। आज जब महिलाएं आगे आकर नारे लगा रही हैं, गिरफ्तारियां झेल रही हैं और जोखिम उठा रही हैं, तो यह उसी अधूरी कहानी का विस्तार लगता है जो 2009 में अधर में छूट गई थी।
केंद्र सरकार की नीतियों के केंद्र में महिला नेतृत्व वाला विकास : केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी!



