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नर्स निमिषा प्रिया की फांसी पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, राजनयिक हस्तक्षेप की गुहार!

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यमन में हत्या के आरोप में मौत की सजा पा चुकी भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की फांसी को रोकने की मांग को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। यह याचिका सेव निमिषा प्रिया इंटरनेशनल एक्शन काउंसिल नामक संगठन द्वारा दाखिल की गई है, जिसमें केंद्र सरकार से राजनयिक हस्तक्षेप कर निमिषा की जान बचाने की अपील की गई है।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस संवेदनशील मामले की सुनवाई करेगी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि केंद्र सरकार को यमन सरकार से संपर्क कर निमिषा की फांसी को रोका जाना चाहिए क्योंकि यह मामला केवल कानूनी नहीं, मानवीय और राजनयिक स्तर का भी है।

यमन की अदालत द्वारा निमिषा को 16 जुलाई 2025 को फांसी दिए जाने का आदेश दिया गया है। इसके पहले, निमिषा के परिजन केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद की गुहार लगा चुके हैं। मुख्यमंत्री विजयन ने खुद प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर केंद्र से राजनयिक स्तर पर हस्तक्षेप की मांग की है। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि, “हम निमिषा प्रिया के परिजनों को हर संभव सहायता देने के प्रयास कर रहे हैं।”

यमन की अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, निमिषा प्रिया पर अपने बिजनेस पार्टनर तलाल अब्दो मेहदी की हत्या करने का आरोप है। आरोप है कि हत्या के बाद, उन्होंने अपने एक नर्स सहयोगी की मदद से शव को टुकड़ों में काटकर टैंक में फेंक दिया था। इस घटना ने उस समय यमन में खलबली मचा दी थी।

निमिषा प्रिया के परिवार ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। परिजनों का कहना है कि निमिषा ने तलाल को कोई जानलेवा चोट नहीं पहुंचाई थी, बल्कि वह अपना जब्त पासपोर्ट वापस लेने के लिए उसे बेहोशी का इंजेक्शन देना चाहती थी। लेकिन गलती से ओवरडोज हो गया, जिससे उसकी मौत हो गई। परिजनों का दावा है कि यह पूर्वनियोजित हत्या नहीं बल्कि एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा था।

निमिषा ने यमन की सर्वोच्च अदालत में फांसी की सजा के खिलाफ याचिका दायर की थी, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने यमन के राष्ट्रपति से दया याचिका भी लगाई, लेकिन वह भी अस्वीकृत हो गई। अब निगाहें भारत के सर्वोच्च न्यायालय पर हैं, जहाँ आज इस याचिका पर सुनवाई होनी है। यह देखा जाना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट भारत सरकार को यमन में सक्रिय हस्तक्षेप के लिए निर्देश देगा या नहीं। यह मामला राजनयिक, कानूनी और मानवीय तीनों मोर्चों पर एक बड़ी परीक्षा बन चुका है।

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