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Monday, February 9, 2026
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आदिवासी होने का बहाना नहीं चलेगा, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार!

अब आप गरीब आदिवासी होने का दावा कर रहे हैं। यह स्वीकार नहीं किया जाएगा।  

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सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के लातेहार से जुड़े एक गंभीर मामले में ससुराल पक्ष को कड़ी फटकार लगाई है। मामला उस विधवा महिला से जुड़ा है, जिसे पति की मृत्यु के बाद उसके ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया और पति की जीवन बीमा पॉलिसी से मिले पैसे पर कब्जा कर लिया। महिला ने आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट भी की गई।

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अग्रिम जमानत की याचिका पर सुनवाई करते हुए आरोपियों से कहा, “आपने इस गरीब विधवा को केवल उसकी संपत्ति हड़पने के लिए घर से बाहर निकाल दिया। अब आप आदिवासी होने का दावा कर ढाल बनाना चाहते हैं, लेकिन यह स्वीकार नहीं किया जाएगा।” अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण इलाकों में इस तरह की घटनाएं आम हैं और अब इन पर सख्ती से कार्रवाई जरूरी है।

पीठ ने ससुराल पक्ष द्वारा अदालत में दिए गए एक लिखित बयान को रिकॉर्ड में लिया, जिसमें महिला की संपत्ति वापस दिलाने का आश्वासन दिया गया था। जजों ने टिप्पणी की कि यदि यह आश्वासन न होता तो आरोपियों की नियमित जमानत रद्द कर तुरंत गिरफ्तारी का आदेश दिया जाता। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि एक सप्ताह के भीतर संपत्ति महिला को वापस नहीं सौंपी गई तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ ₹5,000-₹5,000 के जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया और लातेहार के पुलिस अधीक्षक को वारंट तामील कर अगली सुनवाई तक अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर तय की है। साथ ही, याचिकाकर्ता बीरेंद्र उरांव की जमानत अवधि को केवल एक हफ्ते के लिए बढ़ाया गया है। इस पूरे घटनाक्रम ने अदालत की संवेदनशीलता और विधवा महिला के अधिकारों की रक्षा के प्रति सख्त रुख को स्पष्ट कर दिया है।

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