महाराष्ट्र के लिए नितिन गडकरी कोई नया नाम नहीं हैं। बुनियादी ढांचे में परिवर्तन कितनी तेज़ी से संभव है, इसकी पहली झलक उन्होंने महाराष्ट्र से ही दिखाई थी। मुझे आज भी उनके लोक निर्माण मंत्री (PWD) के कार्यकाल की स्पष्ट याद है। सही मायनों में उनके विकास मॉडल की नींव उसी दौर में पड़ी। मंत्री रहते हुए उन्होंने जो काम किया, उसने महाराष्ट्र की आधारभूत संरचना की तस्वीर ही बदल दी।
मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे जैसा ऐतिहासिक प्रोजेक्ट कम समय और सीमित लागत में पूरा कर उन्होंने अपनी क्षमता का लोहा दुनिया से मनवाया। मुंबई की ट्रैफिक समस्या को हल करना असंभव माना जाता था, लेकिन 55 फ्लाईओवरों का विशाल नेटवर्क खड़ा कर उन्होंने इसे संभव कर दिखाया। गडकरी सचमुच “पुलों के निर्माता” बन गए। शहरों से लेकर गांवों तक सड़कें पहुंचीं। सरकारी खजाने पर निर्भर हुए बिना खुले बाजार से पूंजी जुटाकर विकास कैसे किया जाता है, इसका उदाहरण उन्होंने महाराष्ट्र राज्य सड़क विकास महामंडल के ज़रिए पेश किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी इसी दक्षता को पहचानते हुए उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया और देशभर की सड़कों, पुलों और सुरंगों की जिम्मेदारी सौंपी।
2014 में केंद्र की जिम्मेदारी मिलने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र का यही “सक्सेस मॉडल” पूरे देश में लागू किया। एक समय भारत में रोजाना सिर्फ 12 किलोमीटर सड़क बनती थी, आज यह आंकड़ा 30 से 37 किलोमीटर प्रतिदिन तक पहुंच चुका है। यह बदलाव केवल गडकरी जी की सटीक योजना और सख्त अनुशासन का परिणाम है।
शुरुआत में जब उनके पास जलमार्ग और शिपिंग मंत्रालय था, तब उन्होंने बंदरगाहों के विकास और उन्हें सड़कों से जोड़ने के लिए ‘सागरमाला’ जैसी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की। वहीं, राष्ट्रीय राजमार्गों, एक्सप्रेसवे और लॉजिस्टिक कॉरिडोर के निर्माण के लिए ‘भारतमाला’ परियोजना को आकार दिया। नदियों को जलमार्ग के रूप में विकसित करने की मूल सोच भी उन्हीं की देन है।
दिल्ली से मुंबई तक केवल 12 घंटे में सफर कराने वाला एशिया का सबसे बड़ा एक्सप्रेस वे आज उनका “सिग्नेचर प्रोजेक्ट” बन चुका है। लेकिन वे सिर्फ सड़कें बनाकर नहीं रुके। भारत की ईंधन आयात पर निर्भरता घटाने के लिए उन्होंने फ्लेक्स-फ्यूल (इथेनॉल), इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसी क्रांतिकारी पहलों को आगे बढ़ाया। इथेनॉल से न केवल विदेशी तेल पर खर्च घटा, बल्कि किसानों को भी अतिरिक्त आय का साधन मिला।
उनकी सोच में “डबल बेनिफिट” हमेशा रहता है। सड़कों के भराव में नदियों की गाद का उपयोग, जिससे नदी भी साफ हुई और लागत भी घटी, इसका बेहतरीन उदाहरण है। प्लास्टिक कचरे और फ्लाई ऐश से सड़क निर्माण कर उन्होंने “कचरे से टिकाऊ विकास” की मिसाल पेश की। हाईवे किनारे हरियाली के लिए निजी कंपनियों को CSR के माध्यम से जोड़ा गया, जिससे रोजगार भी पैदा हुआ और सड़कें भी हरी-भरी बनीं। कई जगहों पर रोड बैरियर के लिए प्लास्टिक की जगह बांस का इस्तेमाल शुरू किया गया।
चाहे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में जोजिला टनल हो या मुंबई समुद्र पर बना ‘अटल सेतु’, नितिन गडकरी ने “असंभव” शब्द को अपने शब्दकोश से बाहर कर दिया है।
गडकरी जी अक्सर कहते हैं, “सड़कें नहीं होंगी तो विकास नहीं होगा।” वे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी का कथन दोहराते हैं| “अमेरिका अमीर है इसलिए वहां सड़कें अच्छी नहीं हैं, बल्कि वहां सड़कें अच्छी हैं इसलिए अमेरिका अमीर है।” इसी सोच के साथ उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत को महामार्गों के सूत्र में पिरो दिया है।
उनसे हुई कई मुलाकातों में मैंने महसूस किया कि उनका दिमाग हर वक्त काम में डूबा रहता है। योजनाएं उनके मन में लगातार आकार लेती रहती हैं। वे खाने के शौकीन जरूर हैं, लेकिन काम के उससे भी बड़े दीवाने। एक मंत्री में जो कल्पनाशीलता, प्रशासनिक साहस और समस्या को समझकर हल निकालने की क्षमता होनी चाहिए, वह गडकरी जी में भरपूर है।
एक उद्यमी और एक नागरिक के तौर पर हम देश से क्या उम्मीद करते हैं? बेहतर सड़कें, मजबूत पुल, आधुनिक सुरंगें और जाम-मुक्त यातायात। यह सब गडकरी ने जमीन पर उतार कर दिखाया है। कई स्थानों पर भारत की परिवहन संरचना विकसित देशों के बराबर खड़ी दिखाई देती है। सबसे अहम बात यह है कि उनके काम में न तो लालफीताशाही है और न ही ढिलाई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की प्रतिष्ठा वैश्विक स्तर पर बढ़ी है, और इसका एक बड़ा कारण रिकॉर्ड समय में खड़ा हुआ बुनियादी ढांचा है। इसका श्रेय निस्संदेह नितिन गडकरी को जाता है।
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