विधानसभा में जन सेना की विधायक लोकम नागा माधवी के सवाल पर जवाब देते हुए नारा लोकेश ने कहा कि गूगल के विशाखापट्टनम में निवेश के ऐलान के बाद अब दूसरी आईटी कंपनियां भी शहर में दिलचस्पी दिखा रही हैं।
राज्य सरकार के मंत्री ने बताया कि डेटा सेंटर आज की डिजिटल और एआई आधारित अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी हैं। ये देश की डेटा संप्रभुता के लिए भी अहम हैं, खासकर मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में।
उन्होंने कहा कि जब प्रस्तावित डेटा सेंटर इकोसिस्टम 6.5 गीगावाट की क्षमता तक पहुंचेगा, तो मौजूदा तकनीक के हिसाब से सालाना करीब 3 टीएमसी पानी की जरूरत होगी। लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया कि नई कूलिंग तकनीक आने से पानी की खपत और कम होगी।
नारा लोकेश ने साफ किया कि डेटा सेंटर के लिए पानी शहर के लोगों के हिस्से से नहीं लिया जाएगा। इसके लिए पोलावरम परियोजना से मिलने वाले औद्योगिक कोटे का पानी इस्तेमाल होगा।
उन्होंने कहा कि सरकार अगले 18 महीने में ग्रेविटी आधारित सप्लाई से विशाखापट्टनम की शहरी पानी की जरूरत पूरी करने को प्रतिबद्ध है। डेटा सेंटर के लिए अलग से पाइपलाइन बिछाई जाएगी।
राज्य सरकार के मंत्री ने तुलना करते हुए कहा कि 1 गीगावाट का थर्मल पावर प्लांट सालाना एक डेटा सेंटर से करीब 10 गुना ज्यादा पानी इस्तेमाल करता है। फिर सिर्फ डेटा सेंटर पर ही पानी को लेकर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं?
नारा लोकेश ने बताया कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने डेटा सेंटर के लिए 6.5 गीगावाट की सीमा तय कर दी है और यह लक्ष्य अब पूरा कर लिया गया है। सरकार उन कंपनियों को प्राथमिकता देगी जो पर्यावरण की जिम्मेदारी दिखाएंगी। विशाखापट्टनम में डेटा सेंटर अदाविवारम-मुडासारलोवा, तार्लुवाड़ा और रामबिल्ली इलाकों में बन रहे हैं।
हालांकि नागरिक समूह इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे पानी और बिजली जैसे संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और पर्यावरण पर असर पड़ेगा। उन्होंने राज्य में सुपर एल नीनो जैसे मौसम के कारण पानी की कमी का हवाला देकर प्रोजेक्ट का विरोध किया है।
सीपीआई और सीपीआई(एम) भी विशाखापट्टनम के आसपास डेटा सेंटर प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। उनका आरोप है कि इससे पर्यावरण, पीने के पानी के स्रोत और जनस्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा।



