अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H-1B वीज़ा पर अचानक लागू किए गए 1 लाख डॉलर शुल्क ने वैश्विक STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथमेटिक्स) टैलेंट को चीन की ओर मोड़ दिया है। इस कदम से अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता को खतरा पैदा हो गया है, जबकि चीन को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में रणनीतिक बढ़त मिल रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका ने अपनी सबसे कीमती संपत्ति ‘टैलेंट’ को सीधे चीन के हाथों में सौंप दिया है। ट्रंप प्रशासन की MAGA नीतियां, उच्च शुल्क और कड़ा प्रशासनिक माहौल, विदेशी शोधकर्ताओं और इंजीनियरों को अमेरिका की जगह चीन की ओर धकेल रही हैं।
चीन अक्टूबर 1 से अपने K वीज़ा को लॉन्च करने जा रहा है, जो वैश्विक STEM पेशेवरों के लिए तेज़ और सरल प्रवेश का मार्ग है। इसके तहत किसी घरेलू स्पॉन्सरशिप की आवश्यकता नहीं है और शोध, स्टार्टअप, और अकादमिक सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
यह कदम चीन के थाउसंड टैलेंट्स प्लान (TTP) की रणनीति का ही विस्तार है। इस योजना के तहत चीन ने विदेश में पढ़े छात्रों और पेशेवरों को वापस बुलाकर अपने तकनीकी बुनियादी ढांचे को मजबूत किया। AI, सेमीकंडक्टर, बायोटेक और अन्य क्षेत्रों में चीन ने अमेरिका के सामने तेजी से बढ़त बनाई।
अब ट्रंप की नीतियों के चलते वही टैलेंट सीधे चीन की गोद में जा रहा है। जहां चीन निवेश और दीर्घकालिक योजना पर ध्यान देता है, अमेरिका शॉर्ट-टर्म राजनीतिक लाभ के लिए टैलेंट को खो रहा है। भारत सहित अन्य देशों के लिए यह एक चेतावनी और अवसर दोनों है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अपने R&D, उच्च शिक्षा और नवाचार प्रणाली को मजबूत करना चाहिए, टैलेंट को रोकने और वैश्विक सहयोग का लाभ उठाने की रणनीति अपनानी चाहिए।
अंततः, टैलेंट ही शक्ति है। चीन इसे समझता रहा, अमेरिका अब कठिन अनुभव से सीख रहा है। यदि अमेरिकी नीति निर्माता सचेत नहीं हुए, तो आने वाला दशक वैश्विक तकनीकी नेतृत्व में बीजिंग का होगा, न कि वॉशिंगटन का।
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