अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापक टैरिफ को अवैध ठहराए जाने के बावजूद अमेरिकी आयातकों को रिफंड पाने में वर्षों लग सकते हैं। अनुमान है कि प्रशासन ने इन अवैध टैरिफ के जरिए लगभग 175 अरब डॉलर तक की वसूली की। हालांकि अदालत ने अपने फैसले में रिफंड के मुद्दे पर कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया है।
अब टैरिफ रिफंड के दावों पर फैसला न्यूयॉर्क स्थित अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय व्यापार न्यायालय (Court of International Trade – CIT) करेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रक्रिया में लंबा समय लग सकता है। जटिल मुकदमेबाजी के चलते यह स्पष्ट नहीं है कि आयातकों को वास्तव में रिफंड मिल भी पाएगा या नहीं।
सीबीएस न्यूज से बातचीत में ग्राउंडवर्क कलेक्टिव के चीफ ऑफ पॉलिसी एंड एडवोकेसी एलेक्स जैक्वेज़ ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ही 1,000 से अधिक कंपनियां टैरिफ रिफंड के लिए आवेदन कर चुकी थीं और यह संख्या आगे बढ़ सकती है।
कानून के तहत आम तौर पर आयातकों के पास कस्टम क्लियरेंस के बाद 314 दिनों तक का समय होता है, जिसके भीतर वे टैरिफ रिफंड की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। आयात के समय कंपनियां अनुमानित टैरिफ का भुगतान करती हैं और अंतिम टैरिफ निर्धारण में 314 दिन तक लग सकते हैं। यदि अनुमानित और अंतिम टैरिफ राशि में अंतर होता है, तो अंतर की राशि या तो वापस की जाती है या अतिरिक्त वसूली की जाती है।
अंतिम टैरिफ निर्धारण के बाद आयातकों के पास 180 दिनों तक अपील कर रिफंड मांगने का विकल्प होता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि पूरी प्रक्रिया अत्यंत जटिल और समयसाध्य है।
यूएस टैरिफ सिस्टम के विशेषज्ञ यूजी तकाना ने निक्केई एशिया से कहा, “टैरिफ रिफंड स्कीम को स्पष्ट होने में कम से कम कई महीने लगेंगे, और लंबे समय में, शायद कई साल लग सकते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि मुकदमेबाजी जटिल और जोखिमपूर्ण होने के बावजूद जोखिम से भरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रशासन के खिलाफ रिफंड मांगने वाली कंपनियों के प्रति संभावित प्रतिशोध को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं। ट्रंप पहले भी सार्वजनिक रूप से उन कंपनियों के खिलाफ बयानबाजी और कानूनी कार्रवाई का संकेत दे चुके हैं, जिनसे वे असहमत रहे हैं। ट्रंप ने स्वयं कहा था,रिफंड के संबंध में हम अगले पांच साल तक कोर्ट में रहेंगे।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि रिफंड पर अंतिम फैसला उनके कार्यकाल के बाद आता है, तो भारी-भरकम रिफंड की जिम्मेदारी उनके उत्तराधिकारी पर आ सकती है। फिलहाल, आयातकों के लिए कानूनी लड़ाई लंबी और अनिश्चित दिखाई दे रही है।
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