29 C
Mumbai
Thursday, September 24, 2026
National Stock Exchange of India Limited
होमदेश दुनिया“विदेशी पैसा क्यों चाहिए?”

“विदेशी पैसा क्यों चाहिए?”

विदेशों से एनजीओ को मिलने वाली फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने समय-समय पर एफसीआरए कानून में संशोधन किए हैं। वर्तमान में इस कानून को और कठोर करना केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है|

Google News Follow

Related

- Advertisement -National Stock Exchange
एक उद्यमी और निवेशक के रूप में जब मैं भारत की आर्थिक प्रगति को देखता हूं, तो मुझे एक बात स्पष्ट रूप से महसूस होती है| किसी भी देश के विकास की नींव उस देश के बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं पर निर्भर होती है। लेकिन दुर्भाग्य से पिछले कुछ दशकों में हमारे देश में विदेशी फंडिंग से संचालित कुछ एनजीओ ने ‘पर्यावरण’ और ‘मानवाधिकार’ के नाम पर भारत की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का विरोध करने और देश की आर्थिक गति को बाधित करने का लगातार काम किया है।
विदेशों से एनजीओ को मिलने वाली फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने समय-समय पर एफसीआरए कानून में संशोधन किए हैं।
वर्तमान में इस कानून को और कठोर करना केवल एक प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत की आर्थिक संप्रभुता और कॉर्पोरेट क्षेत्र की सुरक्षा के लिए बेहद आवश्यक हो गया है।

संशोधित एफसीआरए विधेयक 2026 के तहत जिन एनजीओ का लाइसेंस रद्द होगा, उनकी संपत्ति जब्त करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास आने वाला है। यह उचित ही है। यदि आपको एनजीओ चलाने का अधिकार नहीं होगा, तो आपकी संपत्तियों का इतना बड़ा विस्तार भारत में क्यों होना चाहिए? इन संपत्तियों के माध्यम से आने वाले पैसों से नई गतिविधियां या उपद्रव खड़े नहीं किए जाएंगे, इसकी क्या गारंटी है?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले भी ऐसे कई काम किए हैं, जो कभी असंभव लगते थे। अनुच्छेद 370 का निरसन इसका उदाहरण है। संशोधित एफसीआरए को लेकर भी वे काफी दृढ़ हैं। अमेरिका का कितना भी दबाव हो या देश के भीतर कितना भी दबाव हो, यह विधेयक पारित होगा और मोदी सरकार इसे करके दिखाएगी| मुझे इस पर विश्वास है।

एनजीओ द्वारा विकास परियोजनाओं के खिलाफ किए गए आंदोलनों के कारण देश की जीडीपी 2 से 3 प्रतिशत तक घटी है, ऐसी एक रिपोर्ट आईबी ने 3 जून 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंपी थी। यह कैसे हुआ होगा, इसे समझने के लिए मैं केवल तीन उदाहरण सामने रखता हूं।

कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना

तमिलनाडु स्थित यह परियोजना भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कुछ विदेशी फंड प्राप्त एनजीओ ने स्थानीय लोगों को भड़काकर यहां बड़ा आंदोलन खड़ा किया। जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से विदेशों से करोड़ों रुपये की संदिग्ध धनराशि इस आंदोलन के लिए भेजी गई थी। इसके कारण यह परियोजना कई वर्षों तक अटकी रही।

तूतीकोरिन स्थित स्टरलाइट कॉपर प्लांट

तांबे के उत्पादन में भारत कभी आत्मनिर्भर और निर्यातक देश था। लेकिन तमिलनाडु के तूतीकोरिन स्थित स्टरलाइट प्लांट के खिलाफ एनजीओ द्वारा किए गए उग्र आंदोलन के बाद यह कारखाना बंद हो गया। परिणामस्वरूप भारत को अपनी जरूरतों के लिए तांबा विदेशों से आयात करना पड़ा और विदेशी मुद्रा का भारी नुकसान हुआ। लेख के अनुसार, इस आंदोलन के पीछे विदेशी प्रतिस्पर्धी कंपनियों और उनके वित्तपोषण से चलने वाले संगठनों की भूमिका सामने आई थी।

सरदार सरोवर परियोजना

नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध जैसी विशाल परियोजना को अंतरराष्ट्रीय एनजीओ की मदद से तीन दशकों तक पीछे धकेला गया। इस परियोजना से गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लाखों किसानों को पानी और बिजली मिलने वाली थी। इसी तरह पूर्वोत्तर भारत और उत्तराखंड की कई जलविद्युत तथा खनन परियोजनाओं को आंदोलनों के जाल में फंसाकर देश के औद्योगिक विकास की गति को धीमा किया गया।

आरे मेट्रो कारशेड और वधावन बंदरगाह परियोजना

मुंबई की यातायात समस्या का समाधान मानी जाने वाली मेट्रो-3 की आरे कारशेड परियोजना और पालघर स्थित वधावन बंदरगाह का भी तीव्र विरोध किया गया। पर्यावरण के नाम पर कानूनी अड़चनें पैदा की गईं। याचिकाओं की भरमार के कारण इन परियोजनाओं की लागत हजारों करोड़ रुपये तक बढ़ गई। विकास से जुड़ी बुनियादी परियोजनाओं को इस तरह रोकने से केवल शहर ही नहीं, बल्कि देश के लॉजिस्टिक्स क्षेत्र को भी भारी नुकसान हुआ।

उद्योग जगत में काम करने वाले व्यक्ति के रूप में मुझे स्पष्ट रूप से लगता है कि यदि विकास का विरोध सुनियोजित तरीके से और विदेशी फंडिंग के बल पर किया जा रहा है, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का विषय बन जाता है। इसलिए एनजीओ को मिलने वाला हर रुपया कहां से आता है और कहां खर्च होता है, इसका हिसाब देश के सामने आना ही चाहिए। राष्ट्रीय हित की परियोजनाओं को बिना वजह रोकने वाले संगठनों के वित्तीय स्रोतों पर कड़ी नजर रखना जरूरी है। यदि कोई विदेशी पैसा लेकर आंदोलन कर रहा है, तो उसे जेल भेजा जाना चाहिए।

यदि भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना है, तो हमें उद्योगों के अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा। मेरा दृढ़ विश्वास है कि एफसीआरए कानून में संशोधनों से वास्तविक रूप से समाजोपयोगी कार्य करने वाले संगठनों को प्रोत्साहन मिलेगा, जबकि विदेशी एजेंडे पर काम करने वाले तत्वों पर अंकुश लगेगा।

कॉर्पोरेट लेंस
लेखक: प्रशांत कारुळकरयह भी पढ़ें-

National Stock Exchange

लेखक से अधिक

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

Star Housing Finance Limited

हमें फॉलो करें

150,264फैंसलाइक करें
526फॉलोवरफॉलो करें
335,000सब्सक्राइबर्ससब्सक्राइब करें

अन्य लेटेस्ट खबरें