भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित तनाव या संघर्ष की स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह स्वतः भारत के पक्ष में खड़ा नहीं होगा। अमेरिकी अधिकारियों ने हालिया कूटनीतिक वार्ताओं में यह संदेश दिया है कि किसी भी स्थिति में उनका रुख केवल अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होगा।
संडे गार्जियन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी पक्ष ने साफ किया है कि भारत एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार जरूर है, खासकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वॉशिंगटन हर संकट में बिना शर्त समर्थन देगा।
नहीं मिलेगा गठबंधन जैसा समर्थन:
अमेरिकी अधिकारियों ने बातचीत में रणनीतिक यथार्थवादपर जोर देते हुए कहा कि अब संबंध नैतिक या भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित सहयोग के जरिए होंगे। यानी जहां हित मेल खाएंगे, वहीं सहयोग होगा। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी टकराव की स्थिति में अमेरिका किसी एक पक्ष का खुलकर समर्थन करने से बचेगा और क्षेत्रीय स्थिरता व तनाव कम करने को प्राथमिकता देगा।
पाकिस्तान को अलग-थलग करने से इनकार:
अमेरिकी अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका भारत-पाक संकट के दौरान पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने के पक्ष में नहीं है। यह रुख नई दिल्ली के लिए असहज करने वाला माना जा रहा है, क्योंकि भारत लंबे समय से सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे पर कड़े अंतरराष्ट्रीय रुख की अपेक्षा करता रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। जहां स्टेट डिपार्टमेंट पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखने पर जोर देता दिख रहा है, वहीं अमेरिकी खुफिया तंत्र ने पाकिस्तान को उन देशों की सूची में शामिल किया है जो लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता विकसित कर रहे हैं और अमेरिका के लिए संभावित खतरा बन सकते हैं।
चीन को संतुलित करने में भारत की भूमिका अहम
हाल ही में भारत दौरे पर आए अमेरिकी रणनीतिक विशेषज्ञ एल्ब्रिज कोल्बी सहित कई अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर भारत को इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अहम बताया है। रक्षा सहयोग, सह-उत्पादन और तकनीकी साझेदारी पर भी जोर दिया गया है। हालांकि, निजी बातचीत में यह भी स्पष्ट किया गया कि यह सहयोग पूरी तरह हितों के मेल पर निर्भर रहेगा और अमेरिका दक्षिण एशिया के अन्य संघर्षों में सीधे शामिल होने से बचेगा।
अमेरिका के इस रुख के बाद भारतीय रक्षा विशेषज्ञों के बीच अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर बहस तेज हो गई है। 2019 के भारत-पाक हवाई संघर्ष का उदाहरण देते हुए विश्लेषकों का कहना है कि उस समय पाकिस्तान ने अमेरिकी F-16 विमानों का उपयोग किया, यह उपयोग अमेरिकी एंड-यूज मॉनिटरिंग नियमों के खिलाफ था, जो इन विमानों को केवल आतंकवाद-रोधी अभियानों तक सीमित करते हैं। जिससे अमेरिका पर भरोसे को लेकर पहले ही सवाल उठते रहें है।
भारत ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपनी विदेश और रक्षा नीति को रणनीतिक स्वायत्तता के आधार पर विकसित किया है। रूस और फ्रांस के साथ मजबूत रक्षा सहयोग, साथ ही ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहल, इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। इसके अलावा बिना किसी बाहरी दबाव के भारत चीन के साथ अपने संबंधों को भी स्वतंत्र रूप से मैनेज कर रहा है, ।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति साफ करती है कि वैश्विक राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं।हर देश अपने हितों को प्राथमिकता दे रहा है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी हो गया है कि वह अपनी रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करे, विभिन्न देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे, और किसी एक शक्ति पर निर्भरता कम करे।
यह घटनाक्रम एक बार फिर यह याद दिलाता है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में किसी भी देश के लिए अपनी सुरक्षा और संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिए केवल बाहरी समर्थन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
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