पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच पाकिस्तान ने संकेत दिए हैं कि वह ईरान संघर्ष में खिंच सकता है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा है कि उन्होंने अपने ईरानी समकक्ष को सऊदी अरब पर मिसाइल या ड्रोन हमले न करने की चेतावनी दी थी और दोनों देशों के बीच हुए रक्षा समझौते का हवाला दिया था। यह पहला अवसर है जब किसी पाकिस्तानी अधिकारी ने बताया है कि सऊदी अरब के साथ हुआ रक्षा समझौता मौजूदा ईरान युद्ध पर भी लागू हो सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, इशाक डार ने मंगलवार को कहा, “मैंने उन्हें (ईरान को) समझाया कि हमारे बीच एक रक्षा समझौता है।” ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी सैन्य ठिकानों, दूतावासों और ऊर्जा अवसंरचना को निशाना बनाया। मंगलवार (3 मार्च) को रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास परिसर में मौजूद CIA मुख्यालय पर ईरानी ड्रोन से हमला किया गया। इससे एक दिन पहले सऊदी अरब की प्रमुख रास तनुरा तेल रिफाइनरी पर हमला हुआ, जिसके चलते वहां संचालन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा। रियाद स्थित अमेरिकी दूतावास भी निशाने पर रहा।
डार ने दावा किया कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रक्षा समझौते ने रियाद पर और बड़े हमलों को रोकने में भूमिका निभाई। डार के अनुसार अन्य सभी देशों के विपरीत, सऊदी अरब पर सबसे कम हमले हुए। इसके बदले ईरान ने आश्वासन मांगा कि सऊदी भूमि का उपयोग उसके खिलाफ हमलों के लिए न किया जाए।
सितंबर 2025 में हस्ताक्षरित यह नाटो-शैली का रक्षा समझौता कहता है कि किसी एक देश के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई को दोनों के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा। इस समझौते ने वर्षों के कमजोर पड़ते संबंधों के बीच दोनों इस्लामी देशों के औपचारिक सुरक्षा सहयोग को नया आयाम दिया था।
हालांकि ईरान और सऊदी के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। बुधवार (4 मार्च) को सऊदी अरब ने कहा कि वह ईरानी आक्रामकता को जवाब देने के अधिकार रखता है। यह बयान क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के बाद सऊदी प्रेस एजेंसी द्वारा जारी किया गया।
पाकिस्तान के लिए स्थिति जटिल है। देश की लगभग चार करोड़ शिया आबादी ईरान के प्रति सहानुभूति रखती है। हाल में अमेरिका-इज़राइल हमलों में ईरान इस्लामी लीडर खामनेई की मौत के बाद पाकिस्तान में हिंसक प्रदर्शन हुए, जिनमें कम से कम 35 नागरिकों की जान गई।
इसके अलावा पाकिस्तान अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के साथ भी सीमा पर गंभीर संघर्ष में उलझा है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि सऊदी रक्षा समझौते को औपचारिक रूप से लागू किया गया और पाकिस्तान को सैन्य रूप से शामिल होना पड़ा, तो उसे दो मोर्चों पर तनाव झेलना पड़ सकता है, जो उसकी सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
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