विश्व कैंसर दिवस पर यह देखना प्रेरणादायक है कि भारत ने कैंसर के खिलाफ लड़ाई में कितनी लंबी दूरी तय की है। 2022 में अनुमानित 14.6 लाख नए मामलों के 2025 तक बढ़कर 15.7 लाख होने की संभावना है, जो बढ़ती उम्रदराज आबादी और बदलती जीवनशैली के कारण है। फिर भी, पिछले दस वर्षों में वैज्ञानिक शोध, उपचार में नवाचार और मरीज को केंद्र में रखकर शुरू की गई पहलों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जिससे कैंसर देखभाल अधिक प्रभावी, किफायती और सुलभ बन रही है।
सबसे रोमांचक उपलब्धियों में से एक भारत की पहली स्वदेशी CAR-T सेल थेरेपी NexCAR19 (actalycabtagene autoleucel) है। IIT मुंबई, टाटा मेमोरियल सेंटर और उद्योग साझेदार ImmunoACT के सहयोग से, साथ ही नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट अमेरिका के समर्थन से विकसित इस थेरेपी में मरीज की अपनी प्रतिरक्षा कोशिकाओं को पुनःप्रोग्राम कर लिम्फोमा और ल्यूकेमिया जैसे रक्त कैंसर पर हमला कराया जाता है।
2015 में विकास शुरू होने के बाद इसे अक्टूबर 2023 में मंजूरी मिली। क्लिनिकल परीक्षणों में 67% रिस्पॉन्स रेट और गंभीर दुष्प्रभावों की न्यूनतम दर देखी गई। भारत में इसकी कीमत ₹30 लाख से ₹50 लाख के बीच, जबकि अमेरिका में 4 लाख अमेरिकी डॉलर (3 करोड़ 60 लाख रूपए)से अधिक की लागत आती है। यह कीमत मरीजों के लिए चिकित्सा सुलभ बनाती है और सीमित विकल्प वाले मरीजों को नई उम्मीद देती है।
कैंसर रोकथाम के क्षेत्र में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा विकसित भारत की स्वदेशी क्वाड्रिवैलेंट HPV वैक्सीन CERVAVAC ने बड़ी प्रगति दिखाई है। यह HPV प्रकार 6, 11, 16 और 18 को लक्षित करती है, जो अधिकांश सर्वाइकल कैंसर और जननांग के मस्सों के लिए जिम्मेदार होते हैं। यह वैक्सीन 9–26 वर्ष के लड़के और लड़कियों के सुरक्षा के लिए है।
हाल के वर्षों में लॉन्च हुई यह वैक्सीन महिलाओं में भारत के दूसरे सबसे आम सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ बड़ा बदलाव ला रही है। किफायती और स्थानीय उत्पादन के कारण स्कूल और सामुदायिक कार्यक्रमों के माध्यम से HPV-संबंधित कैंसर कम करने के राष्ट्रीय प्रयासों को मजबूती मिली है।
आर्थिक बाधाएं अक्सर इलाज में देरी या रुकावट पैदा करती हैं, लेकिन 2018 में शुरू हुई आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) ने इस स्थिति को बदल दिया है। यह योजना प्रति परिवार प्रति वर्ष ₹5–15 लाख तक का कवरेज देती है और इसमें व्यापक कैंसर उपचार पैकेज शामिल हैं।
अध्ययनों से पता चलता है कि निदान के 30 दिनों के भीतर उपचार शुरू होने में 36% सुधार हुआ है। कम आय वाले परिवारों के लिए इसका मतलब है कि वे बिना भारी कर्ज के जीवनरक्षक कीमोथेरेपी, सर्जरी या रेडिएशन करा सकते हैं।टाटा मेमोरियल सेंटर के नेतृत्व में नेशनल कैंसर ग्रिड (NCG) अब देशभर के 360 से अधिक अस्पतालों को जोड़ चुका है।
वर्चुअल ट्यूमर बोर्ड, साझा दिशानिर्देश, प्रशिक्षण कार्यक्रम और शोध सहयोग के माध्यम से NCG यह सुनिश्चित करता है कि दूरदराज के क्षेत्रों के मरीजों को भी बड़े शहरों जैसी देखभाल मिल सके। यह किफायती बायोसिमिलर और प्रिसिजन मेडिसिन पहल को भी बढ़ावा देता है।
IMRT और IGRT जैसी तकनीकों के प्रसार से रेडिएशन थेरेपी में बड़ा सुधार हुआ है। चेन्नई के अपोलो अस्पताल से शुरू होकर भारत में प्रोटॉन थेरेपी केंद्र स्थापित हो रहे हैं और आगे और केंद्रों की योजना है। क्लिनिकल ट्रायल्स बढ़े हैं और डिजिटल स्वास्थ्य उपकरण बेहतर निदान व फॉलो-अप में मदद कर रहे हैं।
ये उपलब्धियां लक्षित प्रगति को दर्शाती हैं। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी, विशेषज्ञों की कमी और बढ़ती बीमारी दर जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, फिर भी भारत के नवाचार मरीज-केंद्रित देखभाल के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता दिखाते हैं। विश्व कैंसर दिवस पर ये कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि विज्ञान और समानता में निरंतर निवेश से कैंसर-मुक्त भविष्य संभव है।
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