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छात्रों की याददाश्त मजबूत कर सकती है यह १५० साल पुरानी जर्मन तकनीक

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अधिकतर छात्र यह मानते हैं कि वे इसलिए भूल जाते हैं क्योंकि उन्होंने ठीक से पढ़ाई नहीं की। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, समस्या पढ़ाई की कमी नहीं बल्कि समय पर दोहराव (रिवीजन) न होना है। मानव मस्तिष्क की बनावट ऐसी है कि जो जानकारी बार-बार दोहराई नहीं जाती, वह धीरे-धीरे स्मृति से मिटने लगती है। इसी समस्या के समाधान के लिए करीब 140 साल पहले जर्मनी में एक खास अध्ययन तकनीक विकसित की गई थी, जिसे आज स्पेस्ड रिपिटिशन कहा जाता है।

उन्नीसवीं सदी के अंत में जर्मन मनोवैज्ञानिक हरमन एबिंगहॉस ने स्मृति और सीखने पर कई प्रयोग किए। अपने शोध के दौरान उन्होंने फॉरगेटिंग कर्व की अवधारणा दी, जो यह बताती है कि दोहराए बिना नई जानकारी कितनी तेजी से दिमाग से निकल जाती है। एबिंगहॉस ने पाया कि यदि किसी विषय को एक ही बार लंबे समय तक पढ़ने के बजाय निश्चित अंतराल पर दोहराया जाए, तो वह जानकारी दीर्घकालिक स्मृति में अधिक प्रभावी ढंग से संग्रहीत होती है। इसी सिद्धांत को आगे चलकर स्पेस्ड रिपिटिशन कहा गया।

छात्रों के लिए स्पेस्ड रिपिटिशन का मतलब ज्यादा घंटे पढ़ना न होकर एक ही विषय को सही समय पर दोहराना होता है। उदाहरण के तौर पर, किसी अध्याय को एक दिन पढ़ने के बाद अगले दिन उसका संक्षिप्त रिवीजन करना चाहिए, फिर कुछ दिन बाद दोबारा उस अध्याय को दोहराना चाहिए और एक सप्ताह बाद उसे स्मृति से दोहराकर आत्मपरीक्षण करना  चाहिए। इस प्रक्रिया से विषय धीरे-धीरे परिचित लगता है और परीक्षा के समय उसे याद करने में कम मेहनत लगती है।

छात्रों के लिए परीक्षाएं केवल रटने पर नहीं, बल्कि समझ निर्माण करने,  प्रयोग करने और व्यवस्थित उत्तर लेखन पर आधारित होती हैं। विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और यहां तक कि अंग्रेजी साहित्य जैसे विषयों में सूत्रों, परिभाषाओं और अवधारणाओं को लंबे समय तक याद रखना जरूरी होता है। स्पेस्ड रिपिटिशन से अवधारणात्मक स्पष्टता बढ़ती है, लंबे उत्तर लिखना आसान होता है और अंतिम समय की घबराहट कम होती है।

अंतिम दिनों में रटरटकर प्राप्त की गई जानकारी अल्पकालिक स्मृति में जाती है। जो की परीक्षा खत्म होते ही विस्मृती में जाती है। इसके विपरीत, स्पेस्ड रिपिटिशन में मस्तिष्क को थोड़ी-सी भूलने की अनुमति दी जाती है और फिर सही समय पर याद दिलाया जाता है, जिससे स्मृति और मजबूत होती है।

भारी सिलेबस वाले सिस्टम में यह जर्मन तकनीक छात्रों को एक अहम कौशल सिखाती है, जिससे बच्चे स्मार्ट तरीके से सीख पाते है। छोटे-छोटे लेकिन नियमित रिवीजन पैटर्न से केवल परीक्षा के अंक सुधार सकते हैं, बल्कि विषयों की वास्तविक समझ भी विकसित होती हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक पढ़ाई में यह  सालों पुरानी तकनीक आज भी उतनी ही कारगर है, जितनी पहले थी।

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