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Monday, February 23, 2026
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रेचक से चतुर्थ तक, चार प्रकार के होते हैं प्राणायाम

शारीरिक-मानसिक संतुलन में कारगर

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योग और प्राणायाम आज के तनावपूर्ण जीवन में शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने लोगों को प्राणायाम अपनाने की सलाह दी है। मंत्रालय का कहना है कि नियमित प्राणायाम अभ्यास से सांसों पर नियंत्रण आता है और जीवन में संतुलन स्थापित होता है। मंत्रालय ने प्राणायाम के चारों प्रकार के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

पातंजल योग सूत्र में प्राणायाम को चार मुख्य प्रकारों में बांटा गया है। ये प्रकार सांस की गति और प्रवाह के आधार पर समझे जाते हैं। इनका अभ्यास करने से शरीर स्वस्थ रहता है, मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है।

आयुष मंत्रालय के अनुसार, इन चारों प्रकार के प्राणायाम को धीरे-धीरे, सही विधि से और योग विशेषज्ञ की सलाह से सीखना चाहिए। रोजाना 10-15 मिनट का अभ्यास भी काफी फायदेमंद होता है। प्राणायाम न केवल शारीरिक स्वास्थ्य सुधारता है, बल्कि चिंता, तनाव और अनिद्रा जैसी समस्याओं से भी छुटकारा दिलाता है।

बाह्यवृत्ति या रेचक :- यह प्राणायाम का पहला प्रकार है, जिसमें सांस को बाहर निकाला जाता है। इसे रेचक कहा जाता है। इस अभ्यास में फेफड़ों से हवा को पूरी तरह बाहर निकालने पर जोर दिया जाता है। रेचक करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं, फेफड़े साफ होते हैं और तनाव कम होता है।

आभ्यंतरवृत्ति या पूरक :- यह दूसरा प्रकार है, जिसमें सांस को अंदर खींचा जाता है। इसे पूरक कहते हैं। इस अभ्यास में गहरी और नियंत्रित सांस अंदर ली जाती है। इससे ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और मन एकाग्र रहता है।

स्तम्भवृत्ति या कुंभक:- यह प्राणायाम का तीसरा और बेहद महत्वपूर्ण प्रकार है। कुंभक में सांस को रोककर रखा जाता है। इसे दो भागों में बांटा जाता है – अंतःकुंभक (सांस अंदर रोकना) और बाह्यकुंभक (सांस बाहर रोकना)। कुंभक अभ्यास से प्राण शक्ति शरीर में संचित होती है, मन शांत होता है और ध्यान की गहराई बढ़ती है। शुरुआत में इसे धीरे-धीरे और विशेषज्ञ की देखरेख में करना चाहिए।

बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपि या चतुर्थ :- यह चौथा प्रकार है, जिसे चतुर्थ प्राणायाम भी कहा जाता है। यह बाहरी और भीतरी दोनों सांसों के विषयों से परे होता है। इस अवस्था में सांस का प्रवाह स्वाभाविक रूप से रुक जाता है और प्राणायाम की उच्च अवस्था प्राप्त होती है। यह प्रकार बहुत उन्नत है और लंबे अभ्यास के बाद ही संभव होता है। इसमें सांस पर पूर्ण नियंत्रण आ जाता है और योगी को गहन आध्यात्मिक अनुभव होता है।

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