आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में तनाव लगभग हर व्यक्ति का स्थायी साथी बन चुका है। ऑफिस की डेडलाइन, आर्थिक दबाव, रिश्तों की चिंता और सोशल मीडिया का लगातार प्रभाव, ये सभी न केवल हमारे दिमाग पर असर डाल रहे हैं, बल्कि हमारे पेट की सेहत को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुँचा रहे हैं। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि तनाव और पेट की बीमारियों के बीच गहरा और सीधा संबंध है।
तनाव और पाचन तंत्र का रिश्ता
जब कोई व्यक्ति तनाव में होता है, तो शरीर का “फाइट या फ्लाइट” (लड़ो या भागो) सिस्टम सक्रिय हो जाता है। इस दौरान शरीर एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन छोड़ता है, जो ऊर्जा को पाचन जैसी “गैर-जरूरी” गतिविधियों से हटाकर जीवित रहने पर केंद्रित कर देते हैं। हार्वर्ड हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब तनाव बहुत अधिक होता है तो पाचन की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है या अस्थायी रूप से रुक भी सकती है।
हल्के तनाव में पेट दर्द, गैस या दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव (क्रॉनिक स्ट्रेस) पाचन तंत्र को गहराई से नुकसान पहुँचाता है।
दिमाग और पेट का सीधा कनेक्शन
वैज्ञानिक इसे “गट-ब्रेन एक्सिस” कहते हैं, यानी दिमाग और आंतों के बीच दोतरफा संवाद प्रणाली। तनाव इस सिस्टम को बिगाड़ देता है, जिससे आंतों की गति, उनकी दीवारों की मजबूती और अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन प्रभावित होता है।
तनाव के दौरान निकलने वाला एक हार्मोन CRF (कॉर्टिकोट्रोपिन-रिलीज़िंग फैक्टर) आंतों की गतिविधियों को बदल देता है। शोध बताते हैं कि इससे आंतों की दीवारों के बीच की टाइट जंक्शन कमजोर हो जाती हैं, जिससे बैक्टीरिया और विषैले तत्व खून में प्रवेश कर सकते हैं। इस स्थिति को आम भाषा में लीकी गट कहा जाता है, जो सूजन और पोषक तत्वों के सही अवशोषण में बाधा बनती है।
हमारी आंतों में मौजूद अरबों बैक्टीरिया, जिसे गट माइक्रोबायोम भी कहा जाता है, यह पाचन और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहद ज़रूरी हैं। लंबे समय तक तनाव में रहने से अच्छे बैक्टीरिया (जैसे लैक्टोबैसिलस और बिफीडोबैक्टीरियम) कम होने लगते हैं और हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ जाते हैं।
गौरतलब है शरीर का लगभग 95% सेरोटोनिन (खुशी का हार्मोन) आंतों में ही बनता है। माइक्रोबायोम के बिगड़ने से न केवल पाचन खराब होता है, बल्कि चिंता और अवसाद भी बढ़ सकता है। यह एक दुष्चक्र (विषियस साइकिल) बन जाता है, तनाव पेट को खराब करता है और पेट की बीमारी तनाव को बढ़ा देती है।
तनाव से जुड़ी पेट की प्रमुख बीमारियाँ इस प्रकार हैं,
-
IBS (इरिटेबल बाउल सिंड्रोम): पेट दर्द, गैस, कब्ज या दस्त
-
GERD (एसिड रिफ्लक्स): सीने में जलन, खट्टा डकार
-
IBD: आंतों में सूजन और बार-बार दस्त
-
फंक्शनल GI डिसऑर्डर: मतली, ऐंठन, पेट भारी लगना
आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर में 10–15% लोग IBS से प्रभावित हैं और अपने जीवनकाल में 35–70% लोगों को किसी न किसी GI समस्या का सामना करना पड़ता है। अमेरिका में करीब 40% लोग तनाव से जुड़ी पेट की समस्याओं की शिकायत करते हैं।
आज के दौर में समस्या क्यों बढ़ रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली इसकी बड़ी वजह है। लगातार ऑनलाइन रहना, नौकरी की अनिश्चितता, कोविड के बाद बढ़ी मानसिक समस्याएं और सोशल मीडिया से उपजा तनाव, इन सबका असर खासकर मिलेनियल्स और जेन Z पर ज्यादा देखा जा रहा है।
अध्ययनों से यह भी सामने आया है कि पेट की समस्याओं से डिप्रेशन का खतरा 7% और एंग्जायटी का खतरा 8.8% तक बढ़ जाता है। इतिहास में भी देखा गया है कि बड़े युद्ध या प्राकृतिक आपदाओं जैसे तनावपूर्ण दौर के समय पेट की बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े।
अच्छी खबर यह है कि तनाव और पेट की समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है। योग, ध्यान और एक्सरसाइज़, कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT), प्रोबायोटिक्स और संतुलित आहार, डिजिटल डिटॉक्स और अच्छी नींद ये सभी उपाय गट-ब्रेन एक्सिस को संतुलित करने में मदद करते हैं।
तनाव सिर्फ मानसिक समस्या नहीं है, यह हमारे पाचन तंत्र पर भी गहरा असर डालता है। अगर पेट की समस्याएं बार-बार हो रही हैं, तो इसे मामूली गैस या अपच समझकर नजरअंदाज़ न करें। यह शरीर का संकेत हो सकता है कि अब तनाव को गंभीरता से संभालने का समय आ गया है। लक्षण बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना ज़रूरी है—क्योंकि आपका पेट, आपकी मानसिक सेहत की कहानी भी कहता है।



