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1950 के इमिग्रेंट्स एक्ट के तहत कार्रवाई तेज; दो बांग्लादेशी महिलाओं को 24 घंटे में भारत छोड़ने का आदेश

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आसाम में अवैध घुसपैठ के मामलों पर सख्ती बढ़ाते हुए भाजपा की राज्य सरकार ने इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम आसाम) एक्ट, 1950 का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। इसी क्रम में बिस्वनाथ जिला प्रशासन ने दो बांग्लादेशी महिलाओं को 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ने का आदेश जारी किया है। राज्य सरकार लंबे समय से निष्क्रिय पड़े इस कानून को दोबारा सक्रिय कर विदेशी घोषित व्यक्तियों के मामलों का त्वरित निपटारा करना चाहती है।

20 दिसंबर को जारी आदेशों के मुताबिक, असलम खातून और अफुजा बेगम को निर्धारित समयसीमा के भीतर असम और भारत से बाहर जाना होगा। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, दोनों महिलाओं को बिस्वनाथ जिले के विदेशी न्यायाधिकरणों ने वर्ष 2005 में लगभग दो दशक पहले विदेशी घोषित किया था। आदेश में कहा गया है कि विदेशी नागरिक घोषित किए जाने के बाद उनकी भारत और असम में मौजूदगी जनहित और आंतरिक सुरक्षा के लिए हानिकारक मानी जाती है। 1950 के अधिनियम का हवाला देते हुए प्रशासन ने उन्हें 24 घंटे के भीतर प्रस्थान करने और धुबरी, श्रीभूमि या दक्षिण सलमारा–मानकाचर मार्गों का उपयोग करने का निर्देश दिया है, जो बांग्लादेश की ओर निर्वासन के लिए आम तौर पर प्रयुक्त होते हैं।

बिस्वनाथ के पुलिस अधीक्षक अजयग्वरण बसुमतारी ने पुष्टि की कि दोनों महिलाएं फिलहाल गोलपारा जिले के मटिया ट्रांजिट कैंप में हिरासत में हैं। उन्होंने कहा, “वे हिरासत में हैं और उनका निर्वासन प्रक्रिया में है। सीमा सुरक्षा बल से मंजूरी मिलने के बाद इसे अंजाम दिया जाएगा।”

बिस्वनाथ की कार्रवाई से कुछ दिन पहले, 17 दिसंबर को नगांव जिले में भी 15 लोगों को इसी तरह के नोटिस जारी किए गए थे। इन सभी को 1990 से लेकर 2021 तक विदेशी न्यायाधिकरणों द्वारा विदेशी घोषित किया गया था। नगांव के पुलिस अधीक्षक स्वप्ननील डेका के अनुसार, ये सभी मटिया डिटेंशन सेंटर में रखे गए हैं और उनके निर्वासन की प्रक्रिया जारी है। जिला प्रशासन ने पहले बताया था कि 19 दिसंबर को उन्हें बांग्लादेश सीमा की ओर ले जाया गया, हालांकि उनकी वर्तमान स्थिति को लेकर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

नगांव के उपायुक्त देवाशीष शर्मा द्वारा जारी आदेशों में संबंधित न्यायाधिकरणों के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि इन व्यक्तियों का असम और भारत में रहना राज्य सुरक्षा और जनहित के विरुद्ध है। नोटिस में 24 घंटे की समयसीमा और वही निकासी मार्ग बताए गए हैं। शर्मा ने कहा, “इनमें से कई लोगों ने विदेशी घोषित होने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया था, लेकिन उनकी याचिकाएं स्वीकार नहीं की गईं। जिला पुलिस की निगरानी में उन्हें नियत समय पर हटाया जाएगा।”

कैबिनेट द्वारा इस कानून के क्रियान्वयन के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) को मंजूरी दिए जाने के बाद इसका पहला ज्ञात उपयोग सोनितपुर जिले में सामने आया था, जहां इस वर्ष विदेशी घोषित किए गए पांच लोगों को 24 घंटे में देश छोड़ने का आदेश दिया गया। बाद में पुलिस ने बताया कि वे फरार हैं और स्थानीय लोगों का दावा है कि वे वर्षों से इलाके में नहीं रह रहे थे।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा बीते कई महीनों से 1950 के कानून के उपयोग के पक्ष में रहे हैं। जून में उन्होंने कहा था कि यदि जिला आयुक्त प्रथम दृष्टया किसी को विदेशी पाते हैं, तो विदेशी न्यायाधिकरण की प्रक्रिया पूरी होने की प्रतीक्षा किए बिना भी इस अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

इमिग्रेंट्स (एक्सपल्शन फ्रॉम आसाम) एक्ट, 1950 विभाजन के तुरंत बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान से असम में हुए प्रवासन को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था। यह कानून केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि यदि किसी व्यक्ति की मौजूदगी जनसामान्य, समाज के किसी वर्ग या असम के अनुसूचित जनजातियों के लिए हानिकारक मानी जाए, तो उसे तय समय और मार्ग के जरिए राज्य या देश छोड़ने का आदेश दिया जा सके।

इस कानून के अस्तित्व में होने के बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आसाम में घुसपैठों की कार्रवाई रोकने के इसे अप्रयुक्त रखा, वह नहीं चाहते थे की पाकिस्तानी प्रधानमंत्री लियाक़त अली बुरा मान जाए। दशकों तक अप्रयुक्त रहने के बाद, सितंबर में एसओपी को मंजूरी मिलने के साथ यह कानून अब फिर से सक्रिय रूप से लागू किया जा रहा है।

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