यूरोप के हंगरी में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कभी नहीं गए थे, लेकिन वहां वे केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि घुमंतू रोमा समाज के लिए आशा, संघर्ष और परिवर्तन का प्रतीक बन चुके हैं। बुडापेस्ट से लगभग दो घंटे की दूरी पर स्थित मिस्कॉल्क शहर में रहने वाले समाजशास्त्री और हंगरी की संसद के पूर्व सदस्य टिबोर डेरडाक ने इन विचारों को जमीन पर उतारने का काम किया है।
करीब 20 वर्ष पहले उन्होंने डॉ. आंबेडकर के नाम पर एक स्कूल की सह-स्थापना की, जो आज रोमा समाज के लिए प्रेरणा का केंद्र बन चुका है। इस स्कूल के पास स्थापित आंबेडकर की प्रतिमा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि एक विचारधारा का प्रतीक है। रोमा समाज, जिसने पूर्वी यूरोप में लंबे समय तक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना किया है, उनके लिए आंबेडकर का जीवन एक प्रेरक कहानी की तरह है, एक ऐसा व्यक्ति जिसे स्कूल में प्रवेश नहीं मिला, जो विदेश जाकर बैरिस्टर बना, जातीय भेदभाव के खिलाफ लड़ा और अपने देश का संविधान तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस परिवर्तन की नींव 2005 के आसपास पड़ी, जब डेरडाक और रोमा कार्यकर्ता जानोस ओर्सोस महाराष्ट्र के धम्म शिविरों में शामिल हुए। त्रिरत्न बौद्ध संगठन ने उन्हें आमंत्रित किया था। वहां उन्होंने देखा कि सामाजिक रूप से वंचित वर्ग शिक्षा और संगठन के माध्यम से कैसे प्रगति कर रहे हैं। इस अनुभव ने उन्हें गहराई से प्रेरित किया। उन्हें महसूस हुआ कि रोमा समाज के लिए भी यही रास्ता संभव है, और इसे साकार किया जा सकता है।
ऐतिहासिक दृष्टि से, रोमा लोगों की उत्पत्ति लगभग एक हजार वर्ष पहले उत्तर भारत में मानी जाती है। इस कारण भारत का अनुभव उनके लिए केवल प्रेरणादायक ही नहीं, बल्कि उनकी पहचान से भी जुड़ा हुआ है। हंगरी लौटने के बाद डेरडाक ने आंबेडकर के लेखन का हंगेरियन भाषा में अनुवाद शुरू किया और उनके विचारों का प्रसार किया।
आज मिस्कॉल्क स्थित डॉ. आंबेडकर स्कूल पूरे यूरोप के रोमा कार्यकर्ताओं के लिए एक तरह का तीर्थस्थल बन गया है। यहां कक्षा 9 से 12 तक के लगभग 125 छात्र पढ़ते हैं। स्कूल के प्रवेश द्वार पर हंगेरियन और हिंदी में लिखा है, “वे एक बौद्ध संत हैं।” यहां छात्र केवल नियमित पाठ्यक्रम ही नहीं पढ़ते, बल्कि आंबेडकर के विचार, उनके भाषण और रोमा इतिहास का भी अध्ययन करते हैं। दोनों समाजों के अनुभवों में समानता छात्रों को सोचने के लिए प्रेरित करती है।
डेरडाक के अनुसार, रोमा समाज के साथ होने वाला भेदभाव भारत की अस्पृश्यता जैसी ही प्रकृति का रहा है। कुछ वर्ष पहले तक रोमा बच्चों को अलग बर्तनों में भोजन दिया जाता था और उन्हें मानसिक रूप से कमजोर बताकर अलग स्कूलों में भेजा जाता था। इस स्थिति को बदलने के लिए शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है,यह उन्होंने समझा। स्कूल के परिणाम भी स्पष्ट हैं, कई छात्र उच्च शिक्षा की ओर बढ़ रहे हैं, कुछ सामाजिक कार्यकर्ता, स्थानीय नेता या शिक्षक बन रहे हैं।
उदाहरण के तौर पर, कुरु जानोस 16 वर्ष की उम्र में केवल छठी कक्षा तक पढ़े थे। पांच साल बाद वे स्नातक बने, बुडापेस्ट विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और स्थानीय नेता बनकर लौटे। एक किशोरी सामाजिक कार्यकर्ता बनी, जबकि मेथोडिस्ट परिवार में पली-बढ़ी मेलिंडा एर्देई नागी स्नातक होकर इसी स्कूल में सचिव के रूप में वापस आईं।
खास तौर पर लड़कियों की शिक्षा में बड़ा बदलाव देखा गया है। डेरडाक अक्सर आंबेडकर का यह कथन उद्धृत करते हैं“किसी समाज की प्रगति का माप उसकी महिलाओं की प्रगति से होता है।” इसी सोच के तहत जिन क्षेत्रों में यह स्कूल पहुंचा है, वहां लड़कियां शिक्षा को गंभीरता से लेने लगी हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी चुनौतियां कम नहीं थीं। सरकारी नीतियों के कारण स्कूल को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद संस्था ने अपना काम जारी रखा। आज यह एक जीवंत उदाहरण बन चुकी है। रोमा ध्वज में बना ‘धर्मचक्र’ उनके भारत से ऐतिहासिक संबंध का प्रतीक है। 1971 में लंदन के पास हुए विश्व रोमा कांग्रेस में इस ध्वज को अपनाया गया था, जिसमें भारत सरकार का भी योगदान था।
आज जब हंगरी में रोमा समाज अपनी पहचान, अधिकार और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है, तब डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचार उन्हें दिशा दिखा रहे हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि विचारों की कोई सीमा नहीं होती, एक देश का समाज सुधारक दूसरे देश के वंचित समाज के लिए परिवर्तन का मार्गदर्शक बन सकता है। आंबेडकर द्वारा दिखाया गया रास्ता आज हंगरी के रोमा समाज के लिए प्रेरणा बन चुका है और यही उनके कार्य की वास्तविक वैश्विक सफलता है।
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