भारत ने अपनी सामरिक मारक क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए नई पीढ़ी की टैक्टिकल मिसाइल प्रणाली के विकास की शुरुआत कर दी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा शुरू की गई यह परियोजना 1990 के दशक से भारतीय रक्षा तंत्र का अहम हिस्सा रही है मौजूदा पृथ्वी मिसाइल श्रृंखला का स्थान लेगी।
पृथ्वी मिसाइल अपने समय में स्वदेशी तकनीक का बड़ा उदाहरण थी, लेकिन यह लिक्विड फ्यूल (तरल ईंधन) आधारित प्रणाली पर आधारित है, जिसकी वजह से आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में कुछ सीमाएं सामने आई हैं। ऐसे मिसाइलों को लॉन्च से पहले ईंधन भरने की जटिल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, जिससे समय अधिक लगता है और ऑपरेशन के दौरान जोखिम भी बढ़ जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, तेज गति वाले युद्ध के माहौल में यह देरी सैन्य प्रतिक्रिया क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा, लिक्विड फ्यूल सिस्टम का लॉजिस्टिक सेटअप बड़ा होने के कारण दुश्मन द्वारा पहचान और हमले का खतरा भी बढ़ जाता है।
इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए DRDO अब ठोस ईंधन (सॉलिड फ्यूल) पर आधारित नई मिसाइल प्रणाली विकसित कर रहा है। यह मिसाइल कैनिस्टराइज्ड डिजाइन में होगी, यानी इसे एक सील कंटेनर में लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकेगा और यह हमेशा लॉन्च के लिए तैयार स्थिति में रहेगी।
इस नई तकनीक के जरिए मिसाइल को बेहद कम समय में लॉन्च किया जा सकेगा, जिससे “शूट एंड स्कूट” जैसी रणनीति अपनाना संभव होगा, अर्थात लॉन्च के तुरंत बाद प्लेटफॉर्म अपनी स्थिति बदल सकता है, जिससे दुश्मन के जवाबी हमले से बचाव हो सके। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारत की टैक्टिकल मिसाइल क्षमता को अधिक घातक, तेज और सुरक्षित बनाएगा। इससे भविष्य के युद्धों में भारतीय सेना की प्रतिक्रिया गति और सर्वाइवल क्षमता में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा।
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