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Sunday, March 15, 2026
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भारतीय सेना को मिले स्वदेशी टेथर्ड ड्रोन, सीमा निगरानी क्षमता होगी और मजबूत

बैटरी की सीमा न होने के कारण ऐसे ड्रोन कई घंटों या कई दिनों तक लगातार हवा में रहकर निगरानी कर सकते हैं। यही कारण है कि इन्हें ऊंचाई वाले और चुनौतीपूर्ण इलाकों में लंबी अवधि की निगरानी के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है।

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भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए बेंगलुरु स्थित स्टार्टअप थ्रॉटल एयरोस्पेस सिस्टम ने अपने उन्नत टेथर्ड ड्रोन भारतीय सेना को सौंप दिए हैं। मार्च 2026 की शुरुआत में हुई इस डिलीवरी को स्वदेशी रक्षा निर्माण के क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि माना जा रहा है। इन ड्रोन के शामिल होने से भारतीय सेना की संवेदनशील सीमाओं पर लगातार निगरानी रखने की क्षमता और मजबूत होगी।

टेथर्ड ड्रोन पारंपरिक मानव रहित हवाई वाहनों (UAV) से अलग होते हैं। ये ड्रोन एक केबल के माध्यम से जमीन पर मौजूद कंट्रोल स्टेशन से जुड़े रहते हैं, जिससे उन्हें लगातार बिजली आपूर्ति मिलती रहती है और सुरक्षित डेटा ट्रांसमिशन भी संभव होता है। बैटरी की सीमा न होने के कारण ऐसे ड्रोन कई घंटों या कई दिनों तक लगातार हवा में रहकर निगरानी कर सकते हैं। यही कारण है कि इन्हें ऊंचाई वाले और चुनौतीपूर्ण इलाकों में लंबी अवधि की निगरानी के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है।

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इन ड्रोन का हस्तांतरण गोपालपुर सीवर्ड फायरिंग रेंज में किया गया, जहां इनके फील्ड इंटीग्रेशन और ऑपरेशनल परीक्षण भी किए गए। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम इन प्रणालियों को जल्द ही अग्रिम मोर्चों पर तैनात करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

ये ड्रोन ‘बियॉन्ड लाइन ऑफ साइट’ (BLOS) निगरानी क्षमता प्रदान करते हैं और इनमें इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल तथा इन्फ्रारेड कैमरों जैसे उपकरण लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा इन्हें कम्युनिकेशन रिले के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे कठिन और दुर्गम क्षेत्रों में सैनिकों के बीच संपर्क बनाए रखने में मदद मिलती है।

इनकी डिजाइन अत्यधिक ठंड, तेज हवाओं और कठिन मौसम में भी संचालन के लिए तैयार की गई है, जो कि लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहद महत्वपूर्ण है।

यह कदम भारत सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के अनुरूप है, जिसके तहत रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2023 में भारतीय सेना ने लगभग 250 करोड़ रुपये की लागत से 130 टेथर्ड ड्रोन प्रणालियां खरीदने का अनुबंध न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज जैसी कंपनियों के साथ किया था।

 

बेंगलुरु का रक्षा स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से उभर रहा है, जहां  हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन जैसे बड़े संस्थानों के साथ कई निजी कंपनियां भी उन्नत सैन्य तकनीकों पर काम कर रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन, स्वार्म ड्रोन और बहुस्तरीय हवाई निगरानी प्रणाली भविष्य के युद्धों में निर्णायक भूमिका निभाएंगी। ऐसे में टेथर्ड ड्रोन का उपयोग भारतीय सेना की स्थिति की बेहतर समझ और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करेगा।

रक्षा क्षेत्र में इस तरह की स्वदेशी तकनीक की आपूर्ति न केवल आयात पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली चुनौतियों के बीच भारत की सामरिक तैयारी को भी मजबूत बनाएगी।

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