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Tuesday, March 17, 2026
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भारत की एटॉमिक क्लॉक यात्रा, सैटेलाइट नेविगेशन की सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम

आयात से स्वदेशी तक

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अंतरिक्ष कार्यक्रमों में एटॉमिक क्लॉक का महत्व अत्यंत अहम माना जाता है। ये अत्यधिक सटीक समय मापने वाले उपकरण होते हैं, जो रुबिडियम, सीज़ियम या हाइड्रोजन जैसे तत्वों में होने वाले परमाणु संक्रमण की अनुनादी आवृत्ति के आधार पर समय मापते हैं। सामान्य क्वार्ट्ज घड़ियों की तुलना में परमाणु घड़ियाँ अर्थात एटोमिक क्लॉक कहीं अधिक सटीक होती हैं। जहां साधारण घड़ियां कुछ दिनों में एक सेकंड तक का अंतर पैदा कर सकती हैं, वहीं परमाणु घड़ी लगभग 10 करोड़ वर्षों में केवल एक सेकंड का ही अंतर पैदा करती है। यही असाधारण सटीकता सैटेलाइट आधारित नेविगेशन प्रणालियों के लिए बेहद जरूरी होती है, क्योंकि केवल एक नैनोसेकंड की गलती पृथ्वी पर लगभग 30 सेंटीमीटर तक की स्थिति त्रुटि पैदा कर सकती है।

भारत की क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली को क्षेत्रीय NavIC प्रणाली नाम से भी जाना जाता है। यह प्रणाली भी अपने शुरूआती दिनों से ही परमाणु घड़ियों पर निर्भर रही है। इस प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उपग्रह IRNSS-1F मार्च 2016 में प्रक्षेपित किया गया था, यह उपग्रह स्विट्ज़रलैंड में बनी रुबिडियम परमाणु घड़ी से लैस था।

हाल ही में मार्च 2026 में इस घड़ी ने अपनी निर्धारित 10 वर्ष की सेवा अवधि पूरी करने के बाद काम करना बंद कर दिया। इसके कारण उपग्रह अब सीमित सेवाएं जैसे एकतरफा संदेश प्रसारण तो जारी रख सकता है, लेकिन सटीक नेविगेशन सेवाएं देने में अक्षम है। यह घटना स्पष्ट करती है कि सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम की विश्वसनीयता के लिए परमाणु घड़ियां कितनी महत्वपूर्ण होती हैं।

विदेशी तकनीक पर निर्भरता की चुनौती:

इससे पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नेविगेशन उपग्रहों में स्विस कंपनी  स्पेक्ट्राटाइम द्वारा निर्मित रुबिडियम परमाणु आवृत्ति मानक (RAFS) का उपयोग किया जाता था। प्रत्येक उपग्रह में बैकअप के लिए तीन परमाणु घड़ियां लगाई जाती थीं।

हालांकि समय के साथ इनमें से कई घड़ियां समय से पहले ही खराब हो गईं। ऐसी समस्याएं केवल भारत में ही नहीं बल्कि यूरोप की गैलीलियो नेविगेशन प्रणाली में भी सामने आईं। 2017 में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की जांच में संकेत मिला था कि ग्राउंड टेस्टिंग के दौरान हुए शॉर्ट सर्किट इसके संभावित कारण हो सकते हैं।

स्वदेशी परमाणु घड़ी का विकास:

हालांकि विदेशी तकनीक पर निर्भरता के जोखिम को देखते हुए भारत ने स्वदेशी परमाणु घड़ियों के विकास का निर्णय लिया। इसी उद्देश्य से भारतीय रुबिडियम एटॉमिक फ्रीक्वेंसी स्टैंडर्ड यानी भारतीय रुबिडियम परमाणु आवृत्ति मानक (iRAFS) परियोजना शुरू की गई। इस परियोजना के तहत 2022–23 तक इन घड़ियों को पूरी तरह योग्य घोषित कर दिया गया। इनका पहला उपयोग NVS-01 उपग्रह में किया गया, जिसे मई 2023 में प्रक्षेपित किया गया था। तब से NVS श्रृंखला के सभी उपग्रहों में यही स्वदेशी परमाणु घड़ियां लगाई जा रही हैं।

ये घड़ियां आकार में छोटी, रेडिएशन-प्रतिरोधी और अंतरिक्ष के कठोर वातावरण को सहने के लिए डिजाइन की गई हैं। इनकी अनुमानित आयु 10 से 15 वर्ष बताई जाती है।

भारत का स्वतंत्र समय मानक

भारत में परमाणु घड़ी के विकास का कार्य केवल सैटेलाइट तक सीमित नहींहै। काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च की लैब नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी इंडिया ने 2008 से 2011 के बीच देश की पहली स्वदेशी परमाणु ऊर्जा का विकास किया था। इनमें सीजियम फाउंटेन और रुबिडियम आधारित घड़ियां शामिल हैं।

इनका उपयोग भारत के आधिकारिक समय मानक भारतीय मानक समय को बनाए रखने के लिए किया जाता है, जिसकी सटीकता लगभग 2.8 नैनोसेकंड तक है।

विशेषज्ञों के अनुसार IRNSS-1F की घड़ी का बंद होना एक चुनौती जरूर है, लेकिन इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि स्वदेशी तकनीक का विकास कितना आवश्यक है। भारत द्वारा विकसित परमाणु घड़ियां न केवल सैटेलाइट नेविगेशन सेवाओं की निरंतरता सुनिश्चित करेंगी, बल्कि देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेंगी।

 

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