भारत द्वारा हाल के वर्षों में अपनाई गई आक्रामक व्यापार नीति का असर अब वैश्विक स्तर पर दिखाई देने लगा है। विश्व बैंक की नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत के ब्रिटेन (UK) और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) घरेलू कंपनियों के लिए वैश्विक बाजारों तक पहुंच को लगभग दोगुना कर सकते हैं। इससे भारतीय कंपनियों को वर्तमान में उपलब्ध वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग एक-छठे हिस्से से बढ़ाकर करीब एक-तिहाई वैश्विक अर्थव्यवस्था तक प्राथमिकता आधारित बाजार पहुंच मिल सकेगी।
विश्व बैंक ने दक्षिण एशिया में व्यापार सुधारों पर अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि भारत के नए व्यापार समझौते देश की निर्यात क्षमता, प्रतिस्पर्धात्मकता और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यह आकलन ऐसे समय में सामने आया है जब भारत अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर भी तेजी से बातचीत कर रहा है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी भूमिका को मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “भारत के यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम के साथ नए मुक्त व्यापार समझौते घरेलू कंपनियों के लिए प्राथमिकता आधारित अंतरराष्ट्रीय बाजार पहुंच के दायरे को वर्तमान में वैश्विक GDP के एक-छठे हिस्से से बढ़ाकर एक-तिहाई तक पहुंचा देंगे।”
विश्व बैंक के अनुसार, दक्षिण एशिया अभी भी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम खुला व्यापारिक क्षेत्र बना हुआ है। वर्ष 2024 में पूरे क्षेत्र में वस्तुओं का निर्यात GDP का केवल 12 प्रतिशत रहा, जो अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले लगभग आधा है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका एक प्रमुख कारण आयातित मध्यवर्ती वस्तुओं पर ऊंचे शुल्क हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होती है।
नई व्यापार व्यवस्थाओं के तहत भारत द्वारा किए गए शुल्क कटौती के वादों से आयात शुल्क में औसतन लगभग 9 प्रतिशत अंक की कमी आने की उम्मीद है। इससे उद्योगों को सस्ते कच्चे माल और उत्पादन सामग्री उपलब्ध होगी, उत्पादन लागत घटेगी और भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे।
विश्व बैंक का मानना है कि इन सुधारों का लाभ केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा। आयात शुल्क में कमी से उपभोक्ताओं के लिए वस्तुएं सस्ती हो सकती हैं, जिससे विभिन्न आय वर्गों की वास्तविक आय में वृद्धि होगी। विशेष रूप से ग्रामीण परिवारों को इसका अधिक लाभ मिल सकता है, क्योंकि उनके उपभोग में विनिर्मित उत्पादों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत अधिक होती है।
रिपोर्ट में वस्त्र (टेक्सटाइल) और चमड़ा (लेदर) उद्योग को सबसे बड़े संभावित लाभार्थियों में शामिल किया गया है। ये दोनों क्षेत्र निर्यात की मजबूत संभावनाएं रखते हैं, लेकिन वर्तमान में अपेक्षाकृत अधिक आयात शुल्क का सामना कर रहे हैं। शुल्क में कमी से इन उद्योगों को कच्चे माल और मध्यवर्ती उत्पादों तक बेहतर पहुंच मिलेगी, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
हालांकि विश्व बैंक ने यह भी स्वीकार किया है कि व्यापार सीमाओं को खोलने से कुछ घरेलू उत्पादकों के सामने प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। फिर भी संस्था का मानना है कि सस्ते आयातित इनपुट और बेहतर उत्पादकता इस चुनौती की भरपाई करने में मदद करेंगे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगले दस वर्षों में दक्षिण एशिया में लगभग 28 करोड़ लोग कार्यबल में शामिल होंगे। ऐसे में व्यापारिक एकीकरण और निर्यात आधारित विकास रोजगार सृजन के महत्वपूर्ण साधन बन सकते हैं। विश्व बैंक ने सुझाव दिया है कि व्यापार उदारीकरण से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए सरकारों को उत्पादकता सुधार, कारोबारी विस्तार और श्रमिकों की गतिशीलता बढ़ाने जैसे व्यापक आर्थिक सुधारों को भी आगे बढ़ाना होगा।
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