मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक मेडिकल रिपोर्ट में गंभीर गड़बड़ी सामने आने के बाद अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने कहा कि राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई देता है। यह टिप्पणी जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका एक व्यक्ति द्वारा दायर की गई थी, जिसने आरोप लगाया था कि उसके खिलाफ एक झूठा नैरेटिव तैयार किया गया है, जिसमें कहा गया कि उसने शादी का वादा कर महिला के साथ धोखा किया।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसका उस महिला के साथ कोई संबंध नहीं था और न ही उसने शादी का कोई वादा किया था। उसने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस उस पर दबाव बना रही है कि वह महिला से शादी कर ले।
मामले की पिछली सुनवाई में अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि महिला की स्वास्थ्य स्थिति और गर्भावस्था से जुड़ी विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट पेश की जाए। लेकिन जब मामला दोबारा सुनवाई के लिए आया तो कोर्ट के सामने एक अलग ही रिपोर्ट पेश कर दी गई।
रिपोर्ट तिरुनेलवेली सरकारी अस्पताल की मेडिकल टीम की थी, जिसमें यह जांच की गई थी कि महिला गर्भपात के लिए चिकित्सकीय रूप से फिट है या नहीं। अदालत ने पाया कि यह रिपोर्ट उस निर्देश से पूरी तरह अलग थी, जिसमें केवल महिला की स्वास्थ्य स्थिति और गर्भावस्था की जानकारी मांगी गई थी।
इस पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई और सवाल उठाया कि जब गर्भपात से संबंधित कोई राय मांगी ही नहीं गई थी, तो ऐसी रिपोर्ट कैसे प्रस्तुत की गई। जस्टिस विक्टोरिया गौरी ने इसे गंभीर प्रशासनिक चूक बताते हुए सही मेडिकल रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि तिरुनेलवेली सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों की एक नई टीम महिला का उचित मेडिकल परीक्षण कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
सुनवाई के दौरान जस्टिस ने राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सरकार भले ही महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण को प्राथमिकता देने का दावा करती हो, लेकिन इस तरह की घटनाएं जमीनी स्थिति को अलग रूप में दर्शाती हैं।
कोर्ट की यह टिप्पणी उस समय आई जब जांच और मेडिकल प्रक्रिया दोनों में गंभीर खामियों पर सवाल उठे। मामला फिलहाल मद्रास हाईकोर्ट में विचाराधीन है और अदालत ने अब विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट मांगी है।
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