पुणे के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता: LPG के विकल्प के रूप में ‘डाइमेथिल ईथर’ गैस की तैयार

20 साल की रिसर्च का परिणाम

पुणे के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता: LPG के विकल्प के रूप में ‘डाइमेथिल ईथर’ गैस की तैयार

Pune scientists make a major breakthrough: develop dimethyl ether gas as an alternative to LPG

खाड़ी देशों में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने के बाद LPG आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई है। इसी बीच भारत के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। पुणे स्थित CSIR-राष्ट्रीय रासायनिक प्रयोगशाला के शोधकर्ताओं ने डाइमेथिल ईथर (DME) गैस विकसित की है, जिसे भविष्य में एलपीजी का विकल्प माना जा रहा है।

इस शोध का नेतृत्व वैज्ञानिक तिरुमलाईवामी राजा ने किया है। लगभग दो दशकों की मेहनत के बाद टीम ने एक विशेष कैटेलिस्ट विकसित किया, जिसकी मदद से DME गैस का उत्पादन संभव हुआ। 15 मार्च को जारी जानकारी के अनुसार, पुणे स्थित पायलट प्लांट में फिलहाल प्रतिदिन करीब 250 किलोग्राम DME गैस का उत्पादन किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तकनीक को औद्योगिक स्तर पर अपनाया जाता है, तो DME को एलपीजी के साथ लगभग 8% तक मिलाया जा सकता है। इससे भारत की आयातित एलपीजी पर निर्भरता कम होगी और आपूर्ति संकट के समय राहत मिल सकती है।

स्वच्छ और किफायती ईंधन का विकल्प:

वैज्ञानिकों के अनुसार, DME गैस एलपीजी की तुलना में अधिक स्वच्छ तरीके से जलती है और इसकी लौ पारदर्शी होती है, जिससे यह पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल है। इसे घरेलू और औद्योगिक दोनों उपयोगों के लिए अकेले या मिश्रण के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने के बाद यह एलपीजी की तुलना में सस्ती भी हो सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को आर्थिक राहत मिल सकती है।

डॉ. राजा ने इस लंबी शोध यात्रा के बारे में बताया, “…दो दशक पहले, हमने कम लागत और कानूनी तौर पर टिकाऊ तरीके से DME पाने के लिए इस तरह की केमिस्ट्री शुरू की थी। इस लैब से, हमने यह सब कर दिखाया। इसका उद्घाटन उस समय के साइंस और टेक्नोलॉजी मिनिस्टर, डॉ. हर्षवर्धन ने किया था। हमने मेथनॉल के लिए सिनगैस और डायरेक्ट DME के ​​लिए सिनगैस डेवलप किया, ताकि सिनगैस का इस्तेमाल किया जा सके, क्योंकि CO+H2 जहाँ से भी आता है (NG, नेचुरल गैस, बायोमास, वगैरह)। बाद में, हमने मेथनॉल से DME पर फोकस किया, जो एक इनडायरेक्ट तरीका है… हमने एक कैटलिस्ट डेवलप किया और इस कैटलिस्ट के लिए लगभग 5 पेटेंट हासिल किए।”

उन्होंने बताया कि शुरुआती चरण में शोध ‘सिंगैस’ (कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन के मिश्रण) से DME बनाने पर केंद्रित था। बाद में टीम ने मेथनॉल के जरिए DME उत्पादन की अप्रत्यक्ष प्रक्रिया को विकसित किया।

पेटेंट और इंडस्ट्री सहयोग से आगे बढ़ती तकनीक:

डॉ. राजा के अनुसार, उनकी टीम द्वारा विकसित कैटेलिस्ट इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके लिए करीब पांच पेटेंट हासिल किए जा चुके हैं। यह तकनीक 2017 में शुरू किए गए “कटैलिसिस फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट” मिशन के तहत विकसित की गई है और अब टेक्नोलॉजी रेडीनेस लेवल 6–7 तक पहुंच चुकी है, जो इसे बड़े स्तर पर परीक्षण के करीब लाती है।

अब वैज्ञानिक इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए उद्योग जगत के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों के साथ बातचीत चल रही है।

डॉ. राजा ने कहा, “हमने इसे शुरू से ही इंडस्ट्री स्टैंडर्ड के हिसाब से बनाया है। शुरू से ही, हमने इंडस्ट्री की ज़रूरतों पर ध्यान दिया… हम 250 KPD प्लांट के लिए पुणे में एक इंडस्ट्रियल पार्टनर के साथ काम कर रहे हैं। हमारा फैब्रिकेटर भी पुणे में है और भारत की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जल्द ही डिलीवरी देने के लिए तैयार है। हम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड की सबसे बड़ी रिफाइनरी IOCL सहित अलग-अलग PSU के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने हमारे प्रोसेस को सफलतापूर्वक वैलिडेट किया है। अब, हम ONGC से बात कर रहे हैं, जो 2.5-टन-हर-दिन (लगभग 2,500 किलोग्राम हर-दिन) का प्लांट लगाने को तैयार है। एक बार जब यह सेमी-कमर्शियल डेमोंस्ट्रेशन प्लांट से वैलिडेट हो जाएगा, तो इसे किसी भी साइज़ में बढ़ाया जा सकता है। हम काम शुरू करने के लिए तैयार हैं…”

इस उपलब्धि को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है, जो न केवल आयात पर निर्भरता घटा सकती है बल्कि स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा के विकल्प को भी मजबूत कर सकती है।

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