सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 जनवरी)को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित नए भेदभाव-रोधी नियमों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को तत्काल सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई। यह याचिका सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के समक्ष उल्लेखित की गई, जिसकी अध्यक्षता भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्य कांत कर रहे थे। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि यूजीसी के नए नियम सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं।
याचिका का उल्लेख किए जाने के दौरान पीठ ने नियमों को लेकर देशभर में हो रहे विरोध और बहस का संज्ञान लिया। पीठ ने कहा, “हमें भी पता है कि क्या हो रहा है… इसे सूचीबद्ध किया जाएगा… आप याचिका में खामियां दूर करें।” इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को याचिका में मौजूद प्रक्रियात्मक कमियों को दूर करने का निर्देश दिया।
गौरतलब है कि यूजीसी ने 13 जनवरी को नए नियम अधिसूचित किए थे, जिनके तहत देशभर के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में इक्विटी कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया है। इन समितियों का उद्देश्य परिसरों में किसी भी प्रकार के भेदभाव की शिकायतों की जांच करना और समानता को बढ़ावा देना बताया गया है। नए नियमों के अनुसार, इन इक्विटी कमेटियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य होगा।
यह नए नियम यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने) विनियम, 2012 की जगह लाए गए हैं। वर्ष 2012 के नियम मुख्य रूप से सलाहात्मक प्रकृति के थे, जबकि नए विनियम संस्थानों के लिए बाध्यकारी ढांचा तैयार करते हैं। यूजीसी का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समावेशी और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना है।
हालांकि, इन नियमों के अधिसूचित होने के बाद कई राज्यों में छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन किए गए हैं। विरोध करने वाले छात्रों और कुछ संगठनों का आरोप है कि ये प्रावधान मेरिट और समान अवसर के सिद्धांतों को प्रभावित कर सकते हैं। इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका दायर की गई है।
विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सार्वजनिक रूप से आश्वासन दिया है कि इन नियमों के तहत किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और न ही इनका दुरुपयोग होने दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य सभी वर्गों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को सूचीबद्ध किए जाने के बाद यह देखना अहम होगा कि अदालत यूजीसी के नए नियमों की संवैधानिक वैधता और उनके प्रभाव को किस तरह परखती है। इस मामले का फैसला उच्च शिक्षा नीति और परिसरों में समानता से जुड़े विमर्श पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
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