उन्होंने बताया कि करीब 385 करोड़ रुपये खर्च करके बनाए गए इस प्रोजेक्ट का ढांचा महज 9 साल में ही जर्जर हो गया है। बीम और पिलर तक गिरने की स्थिति में पहुंच गए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस आरसीसी संरचना की उम्र कम से कम 50 साल होनी चाहिए थी, वह इतनी जल्दी खराब कैसे हो गई। इससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
मनोज पाटिल ने यह भी कहा कि इस तकनीकी खराबी की वजह से पर्यावरण और आम लोगों के स्वास्थ्य को भारी नुकसान हो रहा है। प्रोजेक्ट की क्षमता 30 एमएलडी होने के बावजूद वर्तमान में केवल 8 एमएलडी सीवेज का ही शोधन किया जा रहा है, जबकि बाकी गंदा पानी सीधे खाड़ी में छोड़ा जा रहा है।
उन्होंने यह भी बताया कि पिछले 25 दिनों से यह प्रोजेक्ट पूरी तरह बंद पड़ा है, जिससे बिना किसी प्रक्रिया के सारा सीवेज सीधे समुद्र में डाला जा रहा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों के अनुसार जहां रोजाना करीब 2 टन गीला कीचड़ निकलना चाहिए, वहां केवल 5 किलो कीचड़ निकल रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रोजेक्ट में प्रक्रिया के नाम पर केवल दिखावा किया जा रहा है।
मनोज पाटिल ने आरोप लगाया कि प्रशासन की लापरवाही के कारण महानगरपालिका को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से करोड़ों रुपये का जुर्माना भरना पड़ रहा है, जिसका बोझ अंततः आम जनता पर पड़ता है।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रोजेक्ट में स्टेनलेस स्टील की जगह माइल्ड स्टील का उपयोग किया गया, जिसकी वजह से मशीनरी जल्दी खराब हो गई। उन्होंने कहा कि केवल 2 करोड़ रुपये का फंड वापस न जाए, इसलिए जल्दबाजी में मरम्मत के प्रस्ताव लाने के बजाय इस पूरे मामले की गहन जांच होनी चाहिए।
विपक्ष नेता मनोज पाटिल ने महापौर अजीव पाटिल से मांग की है कि इस पूरे प्रोजेक्ट पर श्वेतपत्र जारी किया जाए और संबंधित सलाहकारों तथा ठेकेदारों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया जाए, ताकि इस कथित घोटाले की सच्चाई सामने आ सके।



