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होमन्यूज़ अपडेट"समानता का एक रास्ता यूनिफॉर्म सिविल कोड भी है"

“समानता का एक रास्ता यूनिफॉर्म सिविल कोड भी है”

मुस्लिम महिलाओं के विरासत अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी

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सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति में पुरुषों के बराबर अधिकार देने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान विरासत अधिकार सुनिश्चित करने का एक रास्ता यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू करना भी हो सकता है।

मंगलवार (10 मार्च) को सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मुख्य रूप से नीति और विधायी क्षेत्र से जुड़ा मुद्दा है, जिस पर अंतिम निर्णय संसद और सरकार को लेना होता है। मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति में पुरुषों के बराबर अधिकार देने की याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिनमें महिलाओं को विरासत में पुरुषों के बराबर हिस्सा नहीं मिलता। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी पूछा कि क्या अदालत पर्सनल लॉ की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है।

यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ के समक्ष आया। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने एक पुराने फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि उस निर्णय में यह माना गया था कि पर्सनल लॉ को संविधान की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता।

‘सुधार की जल्दबाज़ी में अधिकार न छिन जाएं’

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि यदि अदालत शरीयत के उत्तराधिकार नियमों को रद्द कर देती है, तो क्या इससे कानूनी शून्य (legal vacuum) पैदा नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अलग वैधानिक कानून मौजूद नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताते हुए कहा कि सुधार की जल्दबाज़ी में कहीं ऐसा न हो कि मुस्लिम महिलाओं को मौजूदा अधिकारों से भी वंचित होना पड़े।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि यदि शरीयत के उत्तराधिकार प्रावधानों को हटाया जाता है, तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 लागू किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि अदालत यह घोषित कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर विरासत अधिकार मिलें। भूषण ने यह भी तर्क दिया कि विरासत का अधिकार एक नागरी अधिकार है और इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने सायरा बानो बनाम भारत संघ (ट्रिपल तलाक मामला)का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था।

याचिका में संशोधन का सुझाव

सुनवाई के दौरान पीठ ने सुझाव दिया कि यदि शरीयत के उत्तराधिकार प्रावधानों को रद्द करने की मांग की जा रही है, तो याचिका में यह स्पष्ट किया जाए कि उसकी जगह कौन-सी वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था लागू होगी। इस पर सहमति जताते हुए प्रशांत भूषण ने याचिका में संशोधन करने की बात कही। इसके बाद अदालत ने मामले की सुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी।

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