बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही सियासी पारा चढ़ गया है। पहले चरण के नामांकन की आखिरी तारीख 17 अक्टूबर है, लेकिन एनडीए और महागठबंधन, दोनों खेमों में सीटों का बंटवारा अभी तक फाइनल नहीं हुआ है। इस सियासी घमासान के केंद्र में विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के प्रमुख मुकेश सहनी हैं।
इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, बिना एक भी विधायक वाली उनकी पार्टी के लिए दोनों बड़े गठबंधन किसी भी कीमत पर उन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं, जिससे सहनी की सौदेबाजी की ताकत काफी बढ़ गई है।
मुकेश सहनी इस मौके का पूरा फायदा उठाते हुए महागठबंधन से करीब 30 सीटों की मांग कर रहे हैं, हालांकि उन्हें 10 से 15 सीटें मिलने की संभावना है। वहीं दूसरी ओर, एनडीए भी उन्हें वापस अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश कर रहा है और उन्हें ऐसी सीटें देने का वादा कर रहा है, जहां जीत की संभावना ज्यादा हो।
अगर सहनी एनडीए में जाते हैं, तो यह 2020 विधानसभा चुनाव की स्थिति जैसा ही होगा, जब उन्होंने महागठबंधन द्वारा दी जा रही सीटों से नाखुश होकर एनडीए का दामन थाम लिया था।
मुकेश सहनी कभी बॉलीवुड में सेट डेकोरेटर का काम करते थे। उन्होंने 2013 के आसपास राजनीति में कदम रखा और 2018 में वीआईपी पार्टी बनाई। उन्होंने खुद को सन ऑफ मल्लाह के रूप में स्थापित किया।
2014 में उन्होंने नरेंद्र मोदी का समर्थन किया, तो 2015 तक वे भाजपा के स्टार प्रचारक बन गए। लेकिन 2019 आते-आते वे आरजेडी के साथ चले गए। सहनी के लिए यह खींचतान उनके मल्लाह समुदाय के राजनीतिक महत्व को दर्शाती है, जो कि निषाद समाज का एक बड़ा हिस्सा है और अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) में आता है।
बिहार जाति सर्वेक्षण के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में निषाद समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 9.6% है, जिसमें सहनी की अपनी मल्लाह उप-जाति 2.6% है। उत्तर बिहार के मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, मधुबनी, खगड़िया और वैशाली जैसे कई जिलों में यह समुदाय चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखता है।
एक आरजेडी नेता के अनुसार, निषाद एक अहम वोट बैंक हैं और इन चुनावों में अति पिछड़ी जातियों पर ध्यान केंद्रित करने से उन्हें अपने साथ लाना गठबंधन का सामाजिक आधार बढ़ा सकता है। यही वजह थी कि 2020 में भी भाजपा ने वीआईपी को 11 सीटें दी थीं।
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