रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में प्राकृतिक गैस, तांबा, सोना, कोयला, मत्स्य संसाधन और रणनीतिक रूप से अहम समुद्री तट जैसी विशाल प्राकृतिक संपदाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद, इसी प्रांत की ऊर्जा से वर्षों तक पाकिस्तान के उद्योगों और शहरी केंद्रों को बिजली मिलती रही, लेकिन आज भी यहां के कई इलाकों में लोगों को भरोसेमंद बिजली, स्वच्छ पेयजल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
भीषण बेरोजगारी, खासकर शिक्षित युवाओं के बीच, अवसरों की कमी, निर्णय प्रक्रिया से दूरी और राष्ट्रीय स्वामित्व की भावना के अभाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षेत्र में लंबे समय से संसाधनों का दोहन होता रहा है और लगातार सुरक्षा अभियानों के बावजूद बड़े विकास परियोजनाओं की कोई ठोस घोषणा नहीं की गई।
विदेशों में बसे पाकिस्तानियों के लिए प्रकाशित ऑनलाइन अखबार तर्कीन-ए-वतन में लिखते हुए आलमदार हुसैन मलिक ने कहा, “बलूचिस्तान में हालिया हमले न तो अलग-थलग हिंसक घटनाएं हैं और न ही किसी तात्कालिक अशांति से उपजी सुरक्षा विफलताएं। ये प्रांत और पाकिस्तानी राज्य के बीच दशकों से सुलगते आ रहे एक गहरे, अनसुलझे राजनीतिक संघर्ष की ताजा अभिव्यक्ति हैं।”
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की स्थापना के बाद से ही बलूचिस्तान में बार-बार विद्रोह के चक्र देखने को मिले हैं, जिनकी जड़ें अधूरी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं, विवादित स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों से वंचित किए जाने की भावना में रही हैं।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी समूह अब अपने हमलों को राजनीतिक रियायतें, आर्थिक न्याय और संरचनात्मक सुधार हासिल करने के दबाव के रूप में पेश कर रहे हैं। यह संकेत देता है कि सशस्त्र प्रतिरोध से आगे बढ़कर अब एक स्पष्ट राजनीतिक नैरेटिव उभर रहा है।
हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नागरिकों और राज्य के खिलाफ हिंसा किसी भी रूप में जायज़ नहीं है और इसकी बिना शर्त निंदा की जानी चाहिए। लेकिन केवल कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में इन घटनाओं को देखना बलूचिस्तान को परिभाषित करने वाली गहरी राजनीतिक दरारों को नजरअंदाज करने जैसा होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की लगातार सरकारों ने बलूचिस्तान को एक राजनीतिक प्रश्न के बजाय सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा है। हर बड़ी घटना के बाद सुरक्षा अभियानों में बढ़ोतरी, अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और कड़े प्रशासनिक नियंत्रण लगाए जाते रहे हैं।
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