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Sunday, February 1, 2026
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बिहार: एसआईआर फाइनल सूची पर सीपीआई(एमएल) ने सवाल उठाए!

सीपीआई (एमएल) ने कहा कि एसआईआर की फाइनल लिस्ट में असंगतियां हैं और इनसे जुड़े कई सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं।

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बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले सीपीआई (एमएल) ने एसआईआर की फाइनल सूची को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। पार्टी ने इस संबंध में निर्वाचन आयोग को एक पत्र लिखते हुए पारदर्शिता की मांग की। सीपीआई (एमएल) ने कहा कि एसआईआर की फाइनल लिस्ट में असंगतियां हैं और इनसे जुड़े कई सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं।

पार्टी ने अपने पत्र में कहा कि एसआईआर की ड्राफ्ट लिस्ट में 65 लाख लोगों के नाम काटे गए थे, जिसके बाद फाइनल लिस्ट में 3 लाख 66 हजार और नाम हटाए गए। सीपीआई (एमएल) ने सवाल उठाया कि यह नाम किस आधार पर मतदाता सूची से हटाए गए, इसका कोई सार्वजनिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

पार्टी ने मांग की कि हटाए गए सभी मतदाताओं की सूची कारण सहित, बूथवार जारी की जाए, जैसे पहले 65 लाख मतदाताओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद किया गया था।

पार्टी ने यह भी बताया कि फाइनल लिस्ट में करीब 21 लाख नए मतदाता जोड़े गए हैं, जिनमें से कुछ बिल्कुल नए हैं और कुछ वे हैं जिन्होंने ड्राफ्ट लिस्ट से गलत तरीके से नाम हटाए जाने के बाद दावा-आपत्ति की थी। सीपीआई (एमएल) ने आयोग से यह भी मांग की कि ऐसे पुराने मतदाताओं की भी पूरी सूची बूथवार सार्वजनिक की जाए, जिनके नाम दावा-आपत्ति के बाद बहाल किए गए हैं।

सीपीआई (एमएल) ने महिला मतदाताओं की संख्या में कमी को भी गंभीर चिंता का विषय बताया। पार्टी ने कहा कि बिहार की जनगणना के अनुसार पुरुष-महिला अनुपात 914 है, लेकिन एसआईआर की फाइनल लिस्ट में यह अनुपात 892 दर्शाया गया है। पार्टी ने सवाल किया कि आखिर महिला मतदाताओं की संख्या में गिरावट क्यों दर्ज की गई। पार्टी ने आयोग से इसका स्पष्टीकरण मांगा।

पार्टी ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि करीब 6 हजार ऐसे लोगों के नाम सामने आए हैं जिनकी नागरिकता संदिग्ध बताई जा रही है।

पार्टी ने मांग की कि इन सभी लोगों की सूची और आधार सार्वजनिक किए जाएं, जिनके चलते उनकी नागरिकता पर सवाल उठाया गया है। सीपीआई (एमएल) ने चुनाव आयोग से बिहार विधानसभा चुनाव दो चरणों में कराने का भी आग्रह किया।

पत्र में कहा गया कि कई चरणों में चुनाव प्रक्रिया न केवल थकाऊ और खर्चीली होती है, बल्कि सीमित संसाधनों वाली पार्टियों के लिए यह असमानता भी पैदा करती है।

सीपीआई (एमएल) ने यह भी आरोप लगाया कि कई जिलों में वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार कर कनीय अधिकारियों को परेडिंग ऑफिसर बनाया जा रहा है।

भोजपुर से मिली रिपोर्ट का हवाला देते हुए पार्टी ने आगे कहा कि दलित, मुस्लिम और कमजोर तबकों से आने वाले अधिकारियों को नजरअंदाज कर सामाजिक रूप से प्रभुत्वशाली समूहों के अधिकारियों को प्राथमिकता दी जा रही है। पार्टी ने मांग की कि इस पर राज्यव्यापी जांच की जाए और ऐसे मामलों पर तुरंत रोक लगाई जाए।

चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए पार्टी ने आगे कहा कि पोलिंग एजेंटों को 17सी फॉर्म नहीं दिया जाता, जो मतदान प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। पार्टी ने मांग की कि आयोग इस नियम के कठोर अनुपालन की गारंटी करे।

इसके अलावा, पार्टी ने सुझाव दिया कि दलित, मुसलमान और अन्य वंचित समुदायों के मतदाता अपने क्षेत्र में आसानी से मतदान कर सकें, इसके लिए उनके मोहल्लों में बूथ बनाए जाएं। अगर सरकारी भवन न हों तो चलंत बूथ (मोबाइलल बूथ) की व्यवस्था की जाए।

पार्टी ने उम्मीद जताई कि आयोग इन सभी मुद्दों को गंभीरता से लेगा और आवश्यक कदम उठाएगा ताकि चुनाव प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बना रहे। सीपीआई (एमएल) ने पत्र में आगे कहा कि हमारा उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखना और आम मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना है।

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