सिटी पोस्ट लाइव बिहार विधानसभा चुनावों को लेकर हाल ही में सामने आए एक सर्वे ने सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के खेमे में खलबली मचा दी है। ‘वोट वाइव’ नामक एक एजेंसी द्वारा किए गए इस सर्वे में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ एक मजबूत ‘सत्ता विरोधी लहर’ (एंटी-इनकंबेंसी) दिखाई दे रही है, जिसने एनडीए की चिंता बढ़ा दी है।”
जब लोगों से पूछा गया कि वे सीएम नीतीश कुमार और उनकी सरकार के कामकाज से कितने खुश हैं, तो 48 प्रतिशत लोगों ने सीधे तौर पर अपनी नाखुशी जाहिर की। सिर्फ 27 प्रतिशत लोगों ने ही सरकार के कामकाज का समर्थन किया, जबकि 20 प्रतिशत लोगों ने तटस्थ रुख अपनाया और 4 प्रतिशत ने ‘कुछ कह नहीं सकते’ का जवाब दिया।
सर्वे में विशेष रूप से युवा और ग्रामीण मतदाताओं के बीच असंतोष का उच्च स्तर देखा गया है। सर्वे के लिए 52 प्रतिशत पुरुष और 48 प्रतिशत महिला मतदाताओं का सैंपल लिया गया, जिसमें 70 प्रतिशत ग्रामीण और 30 प्रतिशत शहरी लोग शामिल थे। इन आंकड़ों से पता चलता है कि ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा मौजूदा सरकार के प्रदर्शन से खुश नहीं है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि 18 से 34 साल की उम्र के 55 प्रतिशत युवा मतदाताओं ने नीतीश सरकार के प्रति अपनी नाखुशी व्यक्त की है। यह आंकड़ा एनडीए के लिए बेहद खतरनाक है, क्योंकि युवा मतदाता किसी भी चुनाव का रुख बदल सकते हैं। युवाओं की नाराजगी सीधे तौर पर रोजगार, शिक्षा और भविष्य की उम्मीदों से जुड़ी हुई है।
ग्रामीण मतदाताओं का असंतोष भी यह दर्शाता है कि सरकार की योजनाएं जमीनी स्तर पर उतना असर नहीं कर पाई हैं, जितना दावा किया जा रहा है। गांव के लोगों के लिए बिजली, पानी, सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं आज भी महत्वपूर्ण मुद्दे बनी हुई हैं।
सर्वे के ये नतीजे स्पष्ट संकेत देते हैं कि एनडीए के लिए सत्ता में वापसी की राह आसान नहीं होगी। नीतीश कुमार की राजनीति का मुख्य आधार ‘सुशासन’ यानी अच्छे शासन का मॉडल रहा है, लेकिन 48 प्रतिशत लोगों की नाखुशी यह बताती है कि यह मॉडल अब जनता के बीच कमजोर पड़ रहा है। कानून व्यवस्था, रोजगार की कमी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे मतदाताओं की प्राथमिकता बन गए हैं।
विपक्षी दल, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव, लगातार रोजगार, महंगाई और अपराध के मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं।
यह सर्वे उनके आरोपों को और भी बल देता है। अगर विपक्ष इस असंतोष को सफलतापूर्वक भुना पाता है और असंतुष्ट मतदाताओं को अपने पक्ष में एकजुट कर पाता है, तो यह एनडीए के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
यह सर्वे न केवल एक चुनावी तस्वीर पेश करता है, बल्कि बिहार में मतदाताओं की मनोदशा को भी दर्शाता है, जो आने वाले चुनावों में एक निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
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