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बिहार चुनाव : कुचायकोट सीट पर जदयू का दबदबा, रोजगार और विकास प्रमुख मुद्दे! 

कुचायकोट की पहचान मुख्य रूप से कृषि प्रधान क्षेत्र के रूप में है। यहां के किसान धान, गेहूं और गन्ने जैसी फसलों की खेती करते हैं। 

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बिहार के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में स्थित कुचायकोट विधानसभा सीट गोपालगंज जिले का एक महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्र है। गोपालगंज लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली इस सीट में कुचायकोट और मांझा दो प्रमुख सामुदायिक विकास खंड शामिल हैं।

कुचायकोट की पहचान मुख्य रूप से कृषि प्रधान क्षेत्र के रूप में है। यहां के किसान धान, गेहूं और गन्ने जैसी फसलों की खेती करते हैं। गंडक नहर प्रणाली इस इलाके की कृषि का जीवनदायिनी स्रोत है। यहां के अधिकांश लोग खेती पर निर्भर हैं। हालांकि, रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग यहां से पलायन कर गए हैं।

पिछले कुछ सालों में सड़कों, बिजली और मोबाइल नेटवर्क के विस्तार से गांवों में विकास की रफ्तार तेज हुई है, लेकिन रोजगार की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कुचायकोट विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1951 में हुई थी। हालांकि, 1976 के परिसीमन के बाद यह सीट हटा दी गई थी। इसके बाद, 2008 के परिसीमन में इसे फिर से बहाल किया गया। इस सीट के दोबारा बहाल होने के बाद से अब तक यहां तीन विधानसभा चुनाव (2010, 2015, 2020) हो चुके हैं।

शुरुआत में 1952 से 1972 तक के छह चुनावों में यहां कांग्रेस का दबदबा रहा, जिसने चार बार यहां जीत दर्ज की। लेकिन, 2008 के बाद से यह सीट जदयू के पास लगातार बनी हुई है। यहां के प्रवासी मजदूरों का बड़ा वर्ग रोजगार और विकास को मुख्य मुद्दा मानता है, जबकि स्थानीय ग्रामीण मतदाता जातीय पहचान के साथ-साथ सड़क, सिंचाई और शिक्षा जैसे मुद्दों पर वोट करते हैं।

कुचायकोट की राजनीति में नगीना राय एक ऐतिहासिक नाम हैं। उन्होंने 1967 में निर्दलीय, 1969 में जनता पार्टी, और 1972 में कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर लगातार तीन बार जीत हासिल की थी। बाद में वे इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री भी बने।

नगीना राय के बाद, अमरेंद्र कुमार पांडे ने इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ बनाई। जदयू के टिकट पर उन्होंने 2010, 2015 और 2020 के चुनाव में जीत दर्ज की।

कुचायकोट विधानसभा में ब्राह्मण, यादव और मुस्लिम मतदाता राजनीति की दिशा तय करते हैं। इनमें ब्राह्मण समुदाय का वर्चस्व सबसे अधिक है, और दिलचस्प बात यह है कि नगीना राय को छोड़कर अब तक के सभी निर्वाचित विधायक ब्राह्मण समुदाय से रहे हैं।

ब्राह्मण मतदाता पारंपरिक रूप से भाजपा समर्थक माने जाते हैं, लेकिन अमरेंद्र कुमार पांडे के नेतृत्व में जदयू ने इस वर्ग में गहरी पैठ बना ली है।

दूसरी तरफ, यादव और मुस्लिम मतदाता क्षेत्र में राजद के परंपरागत समर्थन आधार माने जाते हैं, जिससे हर चुनाव में दिलचस्प त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलता है।

2024 के चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र की कुल जनसंख्या 5,64,075 है, जिसमें 2,89,850 पुरुष और 2,74,225 महिलाएं शामिल हैं। वहीं, कुल मतदाताओं की संख्या 3,31,795 है, जिसमें 1,69,311 पुरुष, 1,62,457 महिलाएं और 27 थर्ड जेंडर मतदाता हैं।

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