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मनमोहन सिंह सरकार के दौर में ‘कोलगेट’ घोटाले पर सीएजी को दबाने की कोशिश

पी. सेश कुमार की किताब में खुलासे

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भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों के इतिहास में कोल ब्लॉक अलॉटमेंट घोटाला (कोलगेट) एक ऐसा अध्याय है, जिसने सत्ता की ताकत और संवैधानिक संस्थाओं की ईमानदारी के बीच टकराव को उजागर किया। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी पी. सेश कुमार की नई किताब “Unfolded: How the Audit Trail Heralded Financial Accountability and International Supreme Audit Institution” में उस दौर की सच्चाई सामने आई है, जब यूपीए सरकार ने एक संवैधानिक निगरानी संस्था की आवाज़ को दबाने की कोशिश की।

पी. सेश कुमार कोलगेट ऑडिट के दौरान सीएजी में डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑडिट थे,  उनकी टीम को जांच के लिए कोयला मंत्रालय में एक छोटे, बदबूदार टॉयलेट के बगल वाला कमरे में ठहराया गया था। यह सिर्फ बदइंतजामी नहीं थी। यह एक राजनीतिक संदेश था,“तुम यहां स्वागत योग्य नहीं हो।” उन्होंने कहा, “हमें एक छोटा कमरा दिया गया था जो एक बदबूदार टॉयलेट के पास था। उस समय यह साफ था कि हमारा स्वागत नहीं है।” यह वही दौर था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, जो खुद को संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान का प्रतीक बताते थे, सत्ता में थे।

सीएजी की टीम ने जांच में पाया कि सरकार ने कोयला ब्लॉकों के आवंटन में पारदर्शिता की घोर कमी बरती थी। रिपोर्ट में बताया गया कि इस मनमाने आवंटन के कारण निजी कंपनियों को लगभग ₹1.86 लाख करोड़ का संभावित लाभ (windfall gain) हुआ। कुमार की किताब बताती है कि यह आंकड़ा मनगढ़ंत नहीं था, बल्कि कोल इंडिया लिमिटेड के डेटा पर आधारित था।  दिलचस्प बात यह है कि विंडफॉल गेन शब्द सीएजी का नहीं था, यह खुद तत्कालीन कोयला सचिव के एक आंतरिक नोट से आया था, जिसमें लिखा था कि नीति से निजी कंपनियों को भारी लाभ हो सकता है।

कुमार लिखते हैं कि उनकी टीम को 200 से अधिक स्क्रीनिंग कमेटी बैठकों में से सिर्फ दो-तीन की फाइलें ही दी गईं। कई दस्तावेज़ गायब कर दिए गए, देरी की गई, और हर कदम पर बाधाएं खड़ी की गईं। फिर भी, टीम ने हिम्मत नहीं हारी। छुट्टियों में भी काम जारी रखा, और अंततः एक 2004 की फाइल मिली जिसमें कानून मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के नोट्स मौजूद थे। इस फाइल से पता चला कि 2006 में ही कोल ब्लॉकों की नीलामी की सिफारिश हो चुकी थी, लेकिन सरकार ने वर्षों तक इसे दबाए रखा।

यूपीए सरकार ने इस रिपोर्ट को राजनीतिक हमलें और गलत गणना बताकर खारिज किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री और मंत्रियों ने संसद और प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएजी की आलोचना की। मीडिया के एक वर्ग ने इसे सरकार विरोधी करार दिया।लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बाद में सीएजी की रिपोर्ट को सही ठहराया और 1993 से 2010 के बीच किए गए 214 कोल ब्लॉक आवंटन रद्द कर दिए, यह कहते हुए कि आवंटन “मनमाना और गैरकानूनी” था।

कुमार की किताब याद दिलाती है कि कोल ऑडिट सिर्फ अंकों का खेल नहीं था, यह संवैधानिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक संसाधनों की नैतिकता की लड़ाई थी। कुमार लिखते हैं, “हमारी जीत किसी रिपोर्ट में छपे आंकड़े में नहीं थी, बल्कि इस सिद्धांत में थी कि सार्वजनिक धन की जवाबदेही राजनीति नहीं, लोकतंत्र का दायित्व है।”

यूपीए शासन के दौरान जिस तरह सीएजी की टीम को नीचा दिखाया गया, वह एक चेतावनी थी की स्वतंत्र संस्थाओं की रक्षा सिर्फ शब्दों में नहीं, कर्मों में होनी चाहिए। आज जब भारत में पारदर्शिता और सुशासन की दिशा में सुधार जारी है, पी. सेश कुमार की किताब हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की असली ताकत संस्थाओं की ईमानदारी और साहस में है।

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