गांधी जयंती के दिन देश ने एक सच्चे गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी को खो दिया। डॉ. जी. जी. परिख, जिन्हें “सोशलिस्टों के संत” के नाम से भी जाना जाता था, का 100 वर्ष की आयु में मंगलवार (2 अक्टूबर)सुबह मुंबई के नाना चौक स्थित आवास पर निधन हो गया। वे न केवल आज़ादी की लड़ाई के सिपाही थे, बल्कि खादी आंदोलन, सहकारिता और ग्रामीण उद्योगों को पुनर्जीवित करने वाले प्रमुख कार्यकर्ताओं में से एक थे।
स्वतंत्रता संग्राम से गांधीवाद तक की यात्रा
डॉ. परिख ने अपनी युवावस्था में ही महात्मा गांधी के विचारों को जीवन का आधार बना लिया था। सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज के छात्र रहते हुए वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए और गिरफ्तारी भी दी। 1946 में उन्होंने मुंबई में खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक केंद्र स्थापित किया।
सामाजिक और राजनीतिक योगदान
1960 में अपनी पत्नी मंगलाबेन परिख के साथ उन्होंने रायगढ़ जिले के तारा गांव में यूसुफ मेहरअली केंद्र की स्थापना की, जिसने आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे जीवन भर समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता मूल्यों के समर्थक रहे।
डॉ. परिख मुंबई विलेज इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (MVIA) के चेयरपर्सन थे और 2024 में भी खादी भंडार के पुनरुद्धार अभियान में सक्रिय रूप से शामिल हुए। मई 2024 में वे व्हीलचेयर पर मतदान केंद्र तक पहुंचे और मतदान किया, यह साबित करते हुए कि लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा अंतिम सांस तक कायम रही।
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