आख़िरकार आसाम के अहम् चुनावों से पहले पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन कुमार बोराह ने कांग्रेस से कन्नी काटकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। गुवाहाटी में आसाम भाजपा मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम में असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया की मौजूदगी में उन्होंने औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। उनके साथ युवा कांग्रेस के नेता संजू बरुआ और सर्वनारायण देउरी भी भाजपा में शामिल हुए।
यह घटनाक्रम आगामी विधानसभा चुनावों से पहले सामने आया है, जिसे राज्य की राजनीति में बड़ा झटका माना जा रहा है। इस सप्ताह कांग्रेस से इस्तीफा देते समय भूपेन बोरा ने कथित तौर पर पार्टी सांसद रकीबुल हुसैन को अपने फैसले की एक बड़ी वजह बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि आसाम में कांग्रेस की बागडोर हुसैन के हाथ में है और प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई केवल नाममात्र की भूमिका में हैं। हालांकि रकीबुल हुसैन ने इन आरोपों पर सीधे प्रतिक्रिया नहीं दी है और कहा है कि वह कुछ दिनों में इस विषय पर बात करेंगे।
भूपेन कुमार बोरा पिछले 32 वर्षों से कांग्रेस से जुड़े रहे। उन्होंने 2006 से 2016 तक आसाम विधानसभा में बिहपुरिया सीट का प्रतिनिधित्व करते हुए दो कार्यकाल पूरे किए। वे 2021 से 2024 तक असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC) के अध्यक्ष रहे।
तरुण गोगोई के कार्यकाल में वे राज्य सरकार में प्रवक्ता और संसदीय सचिव भी रहे। छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरुआत करने वाले बोरा नॉर्थ लखीमपुर कॉलेज छात्रसंघ के उपाध्यक्ष और डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर छात्रसंघ के महासचिव रहे।
30 अक्टूबर 1970 को लखीमपुर जिले के पोहुमोरा में जन्मे बोरा ने नॉर्थ लखीमपुर कॉलेज और डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वे छात्र राजनीति में सक्रिय रहे और आल आसाम स्टूडेंट यूनियन (AASU) से जुड़े। उस समय वर्तमान केंद्रीय मंत्री सर्बानंदा सोनोवाल भी विश्वविद्यालय में छात्र थे और दोनों एक ही छात्र संगठन से जुड़े रहे।
कांग्रेस संगठन में बोरा ने एनएसयूआई से लेकर युवा कांग्रेस और प्रदेश कांग्रेस तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं। वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के सचिव भी रहे और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में संगठन को मजबूत करने में भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने असम में लोकसभा चुनाव में तीन सीटें जीती थीं।
भूपेन बोरा का भाजपा में शामिल होना राज्य की सियासत में नए समीकरणों को जन्म दे सकता है, खासकर तब जब विधानसभा चुनाव निकट हैं। राजनीतिक पर्यवेक्षक इसे असम में कांग्रेस के लिए बड़ा झटका और भाजपा के लिए संगठनात्मक मजबूती के रूप में देख रहे हैं।
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