रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल-जून तिमाही में देश की कुल सोने की मांग 131.4 टन रही, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 139.7 टन थी। इस दौरान सबसे अधिक गिरावट आभूषणों (ज्वेलरी) की मांग में देखने को मिली। आंकड़ों के अनुसार, ज्वेलरी की मांग सालाना आधार पर 15 प्रतिशत घटकर 88.8 टन से 75.1 टन रह गई।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से गैर-जरूरी सोने की खरीदारी को कुछ समय के लिए टालने और बचत के वैकल्पिक साधनों पर विचार करने की अपील की थी। उनका कहना था कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और आयात लागत में वृद्धि के कारण विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी ने मई में कहा था, “मैं लोगों से अपील करूंगा कि वे एक वर्ष तक शादियों के लिए सोना न खरीदें।” यह अपील पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उससे पैदा हुई वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच की गई थी।
इस बीच, गुरुवार को एमसीएक्स पर मुनाफावसूली के चलते सोने और चांदी की कीमतों में 1 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व (यूएस फेड) की मौद्रिक नीति के फैसले से पहले मुनाफावसूली की।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि 4,080 डॉलर के आसपास सोने की कीमतों का टिके रहना इस बात का संकेत है कि बाजार एक ओर सख्त मौद्रिक नीति और दूसरी ओर पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने महंगाई पर नियंत्रण के लिए ब्याज दरों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया है और सितंबर में दरों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना भी कम कर दी है। इसके बावजूद वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की मांग फिर से बढ़ सकती है।
हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी फेड का 2 प्रतिशत महंगाई लक्ष्य हासिल करने के लिए सख्त रुख अल्पकाल में सोने की कीमतों के लिए चुनौतीपूर्ण माहौल बना सकता है।
विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में आगामी त्योहारी सीजन और उसके बाद पश्चिमी देशों के हॉलिडे सीजन के दौरान अगले सप्ताह होने वाली भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति, सितंबर में अमेरिकी फेड के फैसले और घरेलू व वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम सोने की कीमतों और ज्वेलरी की बिक्री की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।



